भारत सरकार की चुप्पी देश में लाचारी का बोध पैदा कर रही है। भारतीय विदेश नीति ऐसे मुकाम पर क्यों आ पहुंची, जिसमें ना कोई स्पष्ट रुख दिखता है, और ना ही देश की स्वतंत्र पहचान की रक्षा करने की कोई रणनीति?
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद के दोनों सदनों में बयान दिया, लेकिन विपक्षी सदस्यों को उस पर सवाल पूछने या स्पष्टीकरण मांगने का मौका नहीं दिया गया। विपक्ष इस बेहद गंभीर संकट पर संसद में बहस चाहता है, लेकिन सत्ता पक्ष को उस पर एतराज है! नतीजतन, सरकार जितना कहना चाहती थी, उसके अतिरिक्त जो असमंजस लोगों के मन में हैं, उस पर अस्पष्टता बनी रह गई है। ऐसी कुछ बातों को बाद में कांग्रेस ने अपने सार्वजनिक बयान में शामिल किया।
इसमें ध्यान दिलाया गया कि विदेश मंत्री ने ईरानी नौसेना के जहाज दिना को भारतीय “रणनीतिक क्षेत्र” में डुबोने की अमेरिकी कार्रवाई पर विरोध नहीं जताया, ना ही उन्होंने एक संप्रभु राष्ट्र के राज्य-प्रमुख की हत्या की निंदा की। ना ही उन्होंने जारी युद्ध से भारत के सामने आईं गंभीर भू-आर्थिक और भू-राजनीतिक चुनौतियों के समाधान के बारे में कोई राय रखी। कांग्रेस ने कहा कि इस समय विश्व प्रणाली में आ रहे बुनियादी परिवर्तन के मद्देनजर भारत को क्या नजरिया अपनाना चाहिए, विदेश मंत्री इस संबंध में भी कोई अंतर्दृष्टि सामने रखने में विफल रहे। ये वो बातें हैं, जो भारतीय जनमत के एक बड़े हिस्से के मन में हैं।
जनमत का यह हिस्सा इनको लेकर ना सिर्फ चिंतित है, बल्कि वैश्विक विमर्श में भारत की अनुपस्थिति देखकर आहत भी है। यह व्यग्रता तब और बढ़ जाती है, जब अमेरिकी अधिकारी भारत को ‘अनुमति देनेÓ की बात करते हैं और उनकी ‘निर्देशोंÓ का पालन करने की भारत की ‘अच्छी भूमिकाÓ की तारीफ करते हैं। उनमें से कोई अधिकारी जब भारत की जमीन पर आकर ये एलान करता है कि अमेरिका चीन की तरह भारत के उदय में सहायक नहीं बनेगा, तो ये बेचैनी आक्रोश में बदल जाती है। इन सब पर भारत सरकार की चुप्पी देश में लाचारी का बोध पैदा कर रही है। ऐसे में ये सवाल प्रासंगिक है कि आखिर भारत की विदेश नीति ऐसे मुकाम पर क्यों आ पहुंची, जिसमें ना कोई स्पष्ट रुख नजर आता है, और ना ही देश की स्वतंत्र पहचान की रक्षा करने की कोई रणनीति?

