-सामाजिक कार्यकर्ता ने मांगी विस्तृत जनसूचना
मिल्कीपुर-अयोध्या 27 मार्च (आरएनएस)। चौरासी कोसी परिक्रमा पथ (एनएच-227 बी) मार्ग के निर्माण के दौरान हो रही वृक्ष कटान को लेकर अब मामला गंभीर रूप लेता जा रहा है। क्षेत्र में पेड़ों की कटाई पर लगातार उठ रहे सवालों के बीच सामाजिक कार्यकर्ता अभिषेक सावंत ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, उत्तर प्रदेश लखनऊ से सूचना का अधिकार के तहत विस्तृत जनसूचना मांगी है। अभिषेक सावंत द्वारा दायर आवेदन में वृक्ष कटान से जुड़े कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी और प्रमाणित अभिलेख उपलब्ध कराने की मांग की गई है। उन्होंने वन विभाग द्वारा सड़क किनारे वृक्ष कटान के लिए निर्धारित अधिकृत सीमा (दोनों ओर मीटर/फीट में) का स्पष्ट आदेश और अभिलेख मांगा है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कटान नियमानुसार हो रही है या नहीं। इसके अलावा, उन्होंने परियोजना के अंतर्गत जहां-जहां वृक्ष कटान की अनुमति दी गई है, उन सभी अनुमति एवं स्वीकृति आदेशों की प्रमाणित प्रतियां भी मांगी हैं। साथ ही, सड़क की निर्धारित सीमा से बाहर स्थित वृक्षों की कटाई के लिए यदि कोई अनुमति दी गई है, तो उसका पूरा विवरण भी उपलब्ध कराने को कहा गया है। आवेदन में बीकापुर, इनायत नगर, रेवतीगंज मार्ग तथा ग्राम पंचायत घुरेहटा क्षेत्र में स्वीकृत वृक्षों की कुल संख्या, उनकी प्रजाति-वार जानकारी और वास्तविक रूप से काटे गए पेड़ों का पूरा विभागीय रिकॉर्ड (कटान रजिस्टर, मापन रिपोर्ट, पंचनामा) भी मांगा गया है। सामाजिक कार्यकर्ता ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि स्वीकृत सीमा के बाहर या बिना अनुमति वृक्ष काटे गए हैं, तो उनकी संख्या और इस संबंध में की गई विभागीय जांच रिपोर्ट की प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराई जाए। साथ ही, जांच के लिए नियुक्त अधिकारी या समिति का नाम, पदनाम और संपर्क विवरण भी मांगा गया है।
अभिषेक सावंत ने अवैध वृक्ष कटान की स्थिति में लागू नियमावली, शासनादेश, अधिनियम और दंडात्मक प्रावधानों की प्रतियां देने की भी मांग की है। इसके अतिरिक्त, अब तक इस मामले में विभाग द्वारा की गई कार्यवाही जैसे नोटिस, एफआईआर, जुर्माना या अन्य दंडात्मक कदम का पूरा अभिलेखीय विवरण भी मांगा गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि परिक्रमा पथ निर्माण की आड़ में कई स्थानों पर बड़े पैमाने पर हरे-भरे पेड़ों की कटाई की जा रही है, जिससे पर्यावरण संतुलन पर असर पड़ रहा है। ग्रामीणों में इसको लेकर आक्रोश भी देखा जा रहा है। अब सभी की निगाहें वन विभाग और संबंधित अधिकारियों पर टिकी हैं कि वे इस जनसूचना के माध्यम से कितनी पारदर्शिता बरतते हैं और सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे क्या कार्रवाई होती है। यह मामला न केवल पर्यावरण संरक्षण बल्कि सरकारी कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही की कसौटी भी बनता जा रहा है।
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