श्रावस्ती 3 अप्रैल (आरएनएस )। नए शिक्षा सत्र की शुरुआत के साथ ही शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी गंभीर समस्याएं सामने आने लगी हैं।अप्रैल माह से स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया शुरू होते ही अभिभावक अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए प्राइवेट स्कूलों का रुख कर रहे हैं, लेकिन इसी के साथ उन्हें महंगी किताबों और बढ़ती फीस का भारी बोझझेलना पड़ रहा है जिले के विभिन्न प्राइवेट स्कूलों में नर्सरी से लेकर कक्षा 8 तक की किताबों और फीस के दाम इतने अधिक लिए जाते हैं कि मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए बच्चों को पढ़ाना मुश्किल होता जा रहा है। अभिभावकों का कहना है कि एक बच्चे की किताबों पर ही हजारों रुपये खर्च हो रहे हैं, वहीं स्कूल फीस अलग से देना पड़ता है, जिससे परिवार का मासिक बजट पूरी तरह बिगड़ जा रहा है। जिन परिवारों में एक से अधिक बच्चे हैं, उनके लिए यह समस्या और भी विकट बन गई है। अभिभावकों का कहना है कि स्कूल प्रबंधन द्वारा किताबों की बिक्री को पूरी तरह नियंत्रित किया जाता है। प्रत्येक स्कूल ने अपने-अपने ‘निर्धारित बुक डिपोÓ तय कर रखे हैं, जहां से ही किताबें खरीदना अनिवार्य होता है। अन्य किसी पुस्तक विक्रेता के पास वही किताबें उपलब्ध नहीं कराई जातीं, जिससे अभिभावकों के पास कोई विकल्प नहीं बचता और उन्हें मजबूरी में तय दुकान से ही अधिक कीमत पर किताबें खरीदनी पड़ती हैं। कुछ अभिभावकों का यह भी कहना है कि किताबों की कीमतों में भारी कमीशन जोड़ा जाता है, जिसका लाभ स्कूल प्रबंधन और संबंधित लोगों तक पहुंचता है। इसके अलावा कमीशन के चक्कर में हर वर्ष सभी कक्षाओं की किताबें बदल दी जाती हैं, जिससे पुराने सत्र की किताबें किसी काम की नहीं रह जातीं और हर साल नया खर्च बढ़ जाता है। अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चों को बेहतर भविष्य देना है, लेकिन वर्तमान में यह व्यवस्था पूरी तरह व्यापार का रूप लेती जा रही है। महंगी फीस के साथ-साथ यूनिफॉर्म, जूते, बैग और अन्य शैक्षिक सामग्री पर अतिरिक्त खर्च ने अभिभावकों की परेशानी और बढ़ा दी है। मामले को लेकर अभिभावकों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। अभिभावकों ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से मांग की है कि प्राइवेट स्कूलों द्वारा किताबों और फीस के नाम पर की जा रही मनमानी पर तत्काल रोक लगाई जाए। उन्होंने मांग की है कि सभी कक्षाओं की किताबों की अधिकतम कीमत निर्धारित की जाए और स्कूलों को किसी एक विशेष दुकान से खरीदारी के लिए बाध्य करने पर प्रतिबंध लगाया जाए। साथ ही किताबों को खुले बाजार में उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि अभिभावकों को उचित कीमत पर सामग्री मिल सके। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस गंभीर समस्या को कितनी प्राथमिकता देता है और क्या ठोस कदम उठाकर अभिभावकों को इस आर्थिक बोझ से राहत दिला पाता है। फिलहाल, नए सत्र की शुरुआत के साथ ही अभिभावकों की परेशानियां बढ़ती नजर आ रही हैं।
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

