पटना ,04 अपै्रल ,(आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने देश की अहम संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। शनिवार को उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को पूरी तरह से स्वतंत्र होकर काम करना चाहिए और उन पर किसी भी तरह की राजनीतिक प्रतिक्रिया या दबाव का असर बिल्कुल नहीं पडऩा चाहिए। पटना के चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्मारक व्याख्यान देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने चुनावी प्रक्रिया और राजनीतिक नियंत्रण को लेकर कई गंभीर चिंताएं व्यक्त की हैं।
‘चुनाव आयोग और कैग जैसी संस्थाओं का स्वतंत्र रहना बेहद जरूरीÓ
अधिकारों से परे संविधानवाद के विषय पर अपने विचार रखते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि चुनाव आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (ष्ट्रत्र) और वित्त आयोग जैसी अहम संस्थाओं का डिजाइन एक जैसा ही है। ये संस्थाएं बाहरी प्रभावों से मुक्त और विशेषीकृत हैं। इन्हें ऐसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की देखरेख का जिम्मा सौंपा गया है, जहां निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सामान्य राजनीतिक प्रक्रियाएं शायद काफी न हों। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यह देश के लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है कि ये सभी संस्थाएं बिना किसी राजनीतिक दबाव के स्वतंत्र रूप से अपना काम करें और किसी भी राजनीतिक दल से प्रभावित न हों।
‘चुनाव प्रक्रिया पर नियंत्रण का मतलब पूरी सत्ता पर नियंत्रण हैÓ
भारत के मजबूत लोकतंत्र में चुनाव आयोग की अहम भूमिका पर टिप्पणी करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि चुनाव केवल समय-समय पर होने वाली कोई सामान्य घटना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा ताकतवर तंत्र है जिसके माध्यम से देश की राजनीतिक सत्ता का गठन होता है। उन्होंने कहा कि हमारे संवैधानिक लोकतंत्र ने यह भली-भांति साबित किया है कि समय पर चुनाव होने के कारण ही देश में सरकार का बदलाव सुचारू रूप से हो पाता है। ऐसे में इस चुनाव प्रक्रिया पर नियंत्रण करने का सीधा मतलब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की शर्तों पर ही अपना नियंत्रण कायम करना है। टीएन शेषन बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए उन्होंने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था माना है।
इतिहास से सबक लेने की दी नसीहत, बताई पतन की असली वजह
अपने संबोधन के दौरान एक गहरी चिंता व्यक्त करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर चुनाव कराने वाले लोग ही उन लोगों पर निर्भर हो जाएं जो चुनाव लड़ते हैं, तो इस पूरी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता कभी सुनिश्चित नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि इतिहास हमें यह कड़वा सबक देता है कि किसी भी संवैधानिक ढांचे का पतन तब शुरू होता है जब उसकी संरचना को कमजोर कर दिया जाता है, और आम लोगों के अधिकारों का हनन तो बस उसके बाद की प्रक्रिया है। जब संवैधानिक संस्थाएं एक-दूसरे पर निगरानी रखना बंद कर देती हैं, तब देश में चुनाव होते रहने, संसद के कानून बनाने या अदालतों के काम करते रहने के बावजूद सत्ता पर प्रभावी रूप से कोई अंकुश नहीं रह जाता।
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