नई दिल्ली,05 अपै्रल (आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने निर्वाचन आयोग को चुनावों को निष्पक्ष बनाए रखने वाली प्रमुख संस्था बताते हुए कहा कि यदि चुनाव संचालित करने वाले लोग उम्मीदवारों पर निर्भर हों, तो चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की जा सकती.
शीर्ष कोर्ट की न्यायाधीश ने पटना के चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में राजेंद्र प्रसाद स्मृति व्याख्यान देते हुए मतदान प्रक्रिया की निगरानी करने वाली संस्थाओं की संरचनात्मक स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंता जताई.
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 1995 के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा, ”एक बार फिर यह संरचनात्मक चिंता है कि यदि चुनाव संचालित करने वाले, चुनाव लडऩे वालों पर निर्भर हों, तो प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं की जा सकती.ÓÓ
कोर्ट ने 1995 के इस फैसले में निर्वाचन आयोग को एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था करार दिया था. न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि चुनाव केवल समय-समय पर होने वाली घटनाएं नहीं हैं, बल्कि वे प्रक्रियाएं हैं जिनके माध्यम से सरकार का गठन होता है.
उन्होंने कहा, ”हमारी संवैधानिक लोकतांत्रिक व्यवस्था ने यह प्रदर्शित किया है कि समय पर चुनाव होने से सरकारों का सुचारू रूप से परिवर्तन संभव हुआ है. इस प्रक्रिया पर नियंत्रण, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की शर्तों पर नियंत्रण के समान है.ÓÓ
उन्होंने कहा कि सत्ता केवल औपचारिक संस्थाओं के माध्यम से ही नहीं, बल्कि उन प्रक्रियाओं के जरिए भी संचालित होती है जो उन्हें बनाए रखती हैं, जैसे चुनाव, सार्वजनिक वित्त और विनियमन.
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि सत्ता को नियंत्रित करने वाली संवैधानिक संरचना को इन ‘चौथे स्तंभÓ जैसी संस्थाओं पर भी ध्यान देना होगा. उन्होंने कहा कि ये संस्थाएं भले ही पारंपरिक तीन स्तंभों (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) में न आती हों, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.
सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश ने केंद्र-राज्य संबंधों के मुद्दे पर ”दलगत मतभेदों को अलग रखनेÓÓ की अपील करते हुए कहा कि शासन इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि केंद्र में कौन-सी पार्टी और राज्य में कौन-सी पार्टी सत्ता में है.
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