अभिभावकों की जेब पर हमला जारी
शेमफोर्ड, सेंट जेवियर और सनबीम की शिकायतें ज्यादा
सुल्तानपुर 8 अप्रैल (आरएनएस )। कहते हैं शिक्षा सेवा है पर कुछ निजी विद्यालयों ने इसे ऐसा स्टार्टअप बना दिया है जहाँ मुनाफा ही असली विषय बन चुका है। कॉपी, किताब और ड्रेस अब ज्ञान के साधन नहीं बल्कि पैकेज डील हो चुके हैं और वो भी ऐसी जिसमें ग्राहक (यानी अभिभावक) की कोई पसंद-नापसंद नहीं चलती।
विद्यालय का फरमान साफ है कि कॉपी-किताब वहीं से लो जहाँ हम बताएँगे। ड्रेस उसी दुकान से खरीदो जो मान्य है। और अगर 10वीं में हो तो एनसीईआरटी के साथ बोनस किताब भी ज़रूरी. चाहे उसकी ज़रूरत हो या नहीं। अब सवाल ये है कि ये बोनस ज्ञान के लिए है या बोनस कमाई के लिए? सूत्रों की मानें तो कुछ स्कूलों ने तो खुद ही दुकान खोल ली है। वाह! शिक्षा भी अपनी, दुकान भी अपनी और मुनाफा भी अपना। ऊपर से पब्लिकेशन हाउस के साथ मोटी डील। ताकि हर शाखा में एक ही किताब चले और हर साल वही अनिवार्य खरीदारी जारी रहे। इसे कहते हैं एक तीर से कई जेबें खाली करना। प्रशासन? वो शायद अभी भी फाइलों में नियम-कानून ढूंढ रहा है या फिर इस शिक्षा-व्यापार के सामने उसकी आवाज़ उतनी ही कमजोर है जितनी एक अभिभावक की जेब महीने के अंत में। अभिभावक क्या करे बच्चे का भविष्य दांव पर है. ना कहे तो पढ़ाई पर असर, हाँ कहे तो घर का बजट चरमराए। सवाल ये नहीं कि स्कूल नियम बना रहे हैं। सवाल यह है कि क्या शिक्षा के नाम पर ये मनमानी कब तक चलेगी? कब तक एडमिशन के साथ लूट पैकेज फ्री मिलता रहेगा? और कब जागेगा वो सिस्टम जो इस खेल का रेफरी होना चाहिए?
फटकार नहीं, तथ्य चाहिए, कप्तान पर सवाल उठाने से पहले खबर भी देख लें
सुलतानपुर। जनपद में हाल ही में हुई हाईवे पर ट्रक चालक की हत्या की घटना को लेकर कुछ नाराज पत्रकारों द्वारा पुलिस कप्तान की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये आलोचना तथ्य आधारित है या फिर व्यक्तिगत खीझ का नतीजा?
घटना गंभीर है इसमें कोई दो राय नहीं। प्रयागराज के एक ट्रक चालक की हत्या हाईवे पर होना निश्चित ही चिंता का विषय है। लेकिन इस एक घटना को आधार बनाकर पूरे जिले की पुलिसिंग को नाकाबिल घोषित कर देना क्या जिम्मेदार पत्रकारिता है या सिर्फ सुर्खियां बटोरने का एक और प्रयास। जीपीएस से लोकेशन ट्रैक कर घटना का खुलासा होना यह जरूर दिखाता है कि अपराधी चालाक थे लेकिन यह भी हकीकत है कि पुलिस को सूचना मिलने के बाद ही कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होती है। क्या पत्रकार यह बताना चाहेंगे कि बिना सूचना के पुलिस हर ट्रक के अंदर झांकने की जिम्मेदारी भी निभाए। जहां तक गश्त और चौकी की बात है तो क्या हर किलोमीटर पर पुलिस तैनात कर दी जाए और अगर ऐसा हो भी जाए तो क्या अपराध पूरी तरह खत्म हो जाएंगे। या फिर अगली खबर होगी – हर जगह पुलिस, फिर भी अपराध क्यों? अब बात आती है चार दिन में खुलासा क्यों नहीं हुआ तो क्या हर केस टीवी सीरियल की तरह 24 घंटे में सुलझना चाहिए या फिर जांच को तथ्यों और सबूतों के आधार पर चलने देना चाहिए। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस पत्रकार को इस खबर के बाद पुलिस मीडिया सेल से बाहर किया गया वही अब पुलिस कप्तान की योग्यता पर सवाल उठा रहा है। सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है लेकिन व्यक्तिगत नाराजगी को जनहित का जामा पहनाना थोड़ी ज्यादा ही रचनात्मकता नहीं हो गई। जब खबर में तथ्य कम और तंज ज्यादा हो जाए तो समझ जाइए मामला पत्रकारिता से ज्यादा व्यक्तिगत हो चुका है।
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

