-विश्व को दी होम्योपैथी के माध्यम से सामंजस्य और सीमाओं से परे उपचार की कलजई पद्धति
-विश्व होम्योपैथी दिवस पर विशेष
अयोध्या 9 अप्रैल (आरएनएस)। विश्व होम्योपैथी दिवस पर स्वास्थ्य एवं होम्योपैथी जागरूकता अभियान के तहत संवाद में जनपद के वरिष्ठ होम्योपैथी चिकित्सक एवं होम्योपैथी चिकित्सा विकास महासंघ के महासचिव डॉ उपेंद्र मणि त्रिपाठी ने कहा सामंजस्य, संतुलन और समग्रता प्रकृति के प्रत्येक घटक के स्व में स्थायित्व के लिए आवश्यक है, व्यक्ति के संदर्भ में इसे स्वस्थ अर्थात स्व में स्थित होना कहते हैं। प्रकृति के सिद्धांत को सच्चे अर्थों में ग्रहण कर उसके सदुपयोग की पद्धति का विकास करने वाले महामानव का जन्म आज से 271 वर्ष पूर्व जर्मनी के एक शहर में मिट्टी के बर्तनों पर चित्रकारी कर जीवन यापन करने वाले परिवार में हुआ जिसका नाम पिता ने सैमुएल हैनीमैन रखा। गरीबी के कारण पिता प्राथमिक शिक्षा के बाद आगे पढ़ाने में सक्षम नहीं थे किंतु शिक्षक डॉ मूलर की सहायता एवं प्रेरणा से अपने प्रतिभाशाली पुत्र को केवल बीस मुद्राओं के साथ उच्च शिक्षा के लिए बाहर भेजते हुए भारी मन से कहा बेटा जीवन में जो भी मिले उसका ठीक से परीक्षण कर जो सबसे श्रेष्ठ हो उसे ही ग्रहण करना” और पुत्र ने अपने पिता की इन्हीं पंक्तियों को जैसे जीवन का मंत्र बना लिया। अपनी पढ़ाई का खर्च ट्यूशन से निकालने लगे, दर्जन से अधिक भाषाएं सीखी और ग्रंथों का अनुवाद भी करने लगे। चिकित्सा की उपाधि के बाद चिकित्सकीय कर्म में पीड़ादाई प्रक्रियाओं से असंतुष्ट रहते हुए अध्ययन और अनुवाद के दौरान ही सन 1790 ई. में उन्हें कुलेन की पुस्तक में एक पंक्ति ने विचार पर विवश किया कि कुनैन मलेरिया जैसे लक्षण पैदा करती है इसलिए मलेरिया ठीक कर सकती है, इसे स्वीकार करने से पूर्व उन्होंने पिता की सीख के अनुसार स्वयं पर प्रयोग करके देखना शुरू किया, सही पाया तो अपने परिवार मित्रों पर भी प्रयोग किया और तब जाकर सन 1796 ई. में प्रकृति के चिकित्सा सिद्धांत “समं समे शमयति” पर आधारित रोगी एवं औषधि के समान लक्षणों पर आधारित चिकित्सा पद्धति “होम्योपैथी” का विस्तृत प्रतिपादन किया और वर्तमान में चल रही पद्धति को “एलोपैथी” नाम भी दिया।
डॉ उपेन्द्र मणि ने बताया डॉ हैनीमैन ने प्रथम बार औषधियों का परीक्षण स्वस्थ मनुष्य पर किया और स्वास्थ्य के प्रचलित शारीरिक, मानसिक, सामाजिक आयामों के साथ ही आध्यात्मिक आयाम को महत्व देते हुए स्वास्थ्य की समग्रता को परिभाषित कर होम्योपैथी के माध्यम से सामंजस्य स्थापित कर सीमाओं से परे उपचार की संभावनाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ दर्शन और तर्क से भी पुष्टकृत किया, जिसे स्वाभाविक रूप से प्रारंभिक कई वर्षों तक विरोध एवं प्रतिबंधों तक का सामना करना पड़ा किंतु साल दर साल विज्ञान की परिकल्पनाओं के बदलते रहने के सापेक्ष होम्योपैथी अपने सिद्धांतों पर आज भी अटल अविचल रही ,और अपने परिणामों के चलते ही भारत सहित विश्व के अधिकांश देशों में स्वीकार्य होती चली गई। उपचार की सीमाओं और संभावनाओं के दायरे वैश्विक महामारी काल में भी अधिक विस्तृत होते गए और आज विश्व ने स्वास्थ्य की उसी समग्रता को स्वीकार करना शुरू कर दिया है जिसे डॉ हैनीमैन ने सैकड़ों वर्ष पूर्व ही रेखांकित किया था। सीमा से परे उपचार की संभावनाओं पर विचार करते हुए डॉ उपेन्द्र मणि त्रिपाठी कहते हैं होम्योपैथी औषधियों के उचित प्रयोग प्रशिक्षित चिकित्सक के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए, जबकि आज कल सोसल मीडिया या अन्य माध्यमों से रोग के नाम पर दवाओं के फार्मूले सुन पढ़ कर अन्य पद्धति के चिकित्सक या आम जन स्वयं भी प्रयोग करने लगते हैं, क्योंकि इसमें दुष्परिणाम की संभावनाएं न्यूनतम या नहीं हैं इसलिए कई बार लाभ हो सकता है किंतु उचित उपचार के लिए योग्य चिकित्सक का मार्गदर्शन ही श्रेष्ठ रहता है। होम्योपैथी भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त आयुष की प्रमुख चिकित्सा पद्धति है, इसकी स्वीकार्यता एवं प्रभाव को देखते हुए होम्योपैथी नाम को जोड़कर भ्रम पैदा करने वाले प्रचार से भी आमजन को जागरूक रहना चाहिए, इसका अन्य कोई प्रकार या शाखा नहीं है।
डॉ त्रिपाठी कहते हैं कोरोना काल से पहले और उसके बाद होम्योपैथी पर विश्वसनीयता बढ़ी है। चिकित्सा की प्रत्येक पद्धति की अपनी सीमाएं संभावनाएं होती हैं अत: किसी प्रकार का दावा या भ्रामक प्रचार नहीं करना चाहिए। लक्षणों की विशिष्टता मिलान एवं होम्योपैथी औषधियों के योग्य गुणवत्तापूर्ण चयन से कई बार जटिल और दुस्साध्य समझे जाने रोगों से भी व्यक्ति पूर्ण आरोग्य प्राप्त कर सकता है और उचित मेल न होने पर साधारण से रोग से भी मुक्ति कठिन हो जाती है। अत: निरंतर क्लिनिकल रिप्रूविंग , अध्ययन शोध की आवश्यकता रहती है। हड्डियों के फ्रैक्चर होने पर प्लास्टर के बाद जुडऩे की गति की तीव्रता, एलर्जी, श्वास रोग, पाचन, किडनी के रोग महिलाओं बच्चों आदि के सभी रोग अवस्थाओं में व्यक्तिगत लक्षण आधारित औषधि चयन से स्वास्थ्य की समग्रता में सामंजस्य और वर्तमान द्वंद्व की जीवनशैली में व्यक्ति को तनावमुक्त अवसाद मुक्त बनाने में भी होम्योपैथी चिकित्सक मरीज का संवाद आधारित उपचार पद्धति का महत्वपूर्ण योगदान है।
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