0 जनजाति समाज निभाता है इस परंपरा को
कोरबा, 11 अप्रैल (आरएनएस)। जनजातीय बाहुल्य कोरबा जिले के ग्रामीण अंचलों में मनाया जाने वाला बार रानी महोत्सव आदिवासी संस्कृति का उदाहरण है। इसमें परंपराओं के संरक्षण के साथ सामूहिक भागीदारी का संदेश छिपा हुआ है। बारह दिनों तक चलने वाले इस विशेष आयोजन को ही ‘बार रानीÓ का नाम मिला हुआ है, प्रकृति और ग्राम देवी-देवताओं की पूजा इसमें केंद्रित है।
ग्रामीणों की मान्यता है कि बार रानी की कृपा से गांव में कभी अकाल नहीं पड़ता और भुखमरी जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती। यही वजह है कि इस पर्व को पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। महोत्सव की तैयारी लगभग एक सप्ताह पहले शुरू हो जाती है, जब बार मैदान में बैठक आयोजित कर चंदा और अनाज (विशेषकर चावल) का आकलन किया जाता है। इसी बैठक में समिति का गठन होता है, जिसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सचिव का चयन किया जाता है। गांव के प्रत्येक वार्ड के पंचों को चंदा और चावल एकत्र करने की जिम्मेदारी दी जाती है। ग्रामीण अपनी श्रद्धा अनुसार योगदान देते हैं। एकत्रित राशि से पूजा की सामग्री खरीदी जाती है और गांव के बैगा (पुजारी) के लिए सफेद धोती ली जाती है। जिस पेड़ के नीचे पूजा होती है, उसे भी सफेद वस्त्र से सजाया जाता है। साथ ही कलश, दीपक और अन्य पूजन सामग्री तैयार की जाती है।
इस महोत्सव में दूर-दराज के कलाकार भी आमंत्रित किए जाते हैं, जिन्हें देखने के लिए आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। छोटे-छोटे बाजार भी सजते हैं, जहां खाने-पीने और मनोरंजन की व्यवस्था रहती है। हर तीन वर्ष में आयोजित होने वाला यह पर्व सामाजिक मेल-मिलाप का भी अवसर होता है। लोग अपने घरों में मेहमान बुलाकर उनका स्वागत करते हैं। अंतिम दिन प्रसाद वितरण के साथ उत्सव का समापन होता है और बैगा का विशेष सम्मान किया जाता है।
परंपरागत वाद्य की गूंज से बनता है खास वातावरण
जनजातीय समाज के जानकार बताते हैं कि महोत्सव के लिए पूजा स्थल को विशेष रूप से सजाया जाता है। बार रानी चैरा की सफाई कर चूना से पुताई की जाती है और रंग-बिरंगे पताकों से पूरे परिसर को सजाया जाता है। महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग बैठक व्यवस्था की जाती है। इस दौरान गांव के लोग रोजाना रात में एकत्र होकर नाच-गान करते हैं, जिसमें पारंपरिक वाद्य जैसे ढोल, मादर, नगाड़ा और गुदमा की गूंज पूरे वातावरण को उत्सवमय बना देती है।
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