अहमदाबाद,12 अपै्रल (आरएनएस)। गुजरात हाई कोर्ट ने अहमदाबाद के ओढव इलाके में साल 2017 में हुए चर्चित मां-बेटे के डबल मर्डर केस में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. हाई कोर्ट ने उस आरोपी को बरी कर दिया है, जिसे निचली अदालत ने रेयरेस्ट ऑफ रेयर (दुर्लभ से दुर्लभतम) मामला मानते हुए मौत की सजा सुनाई थी. इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपी को तुरंत जेल से रिहा करने का भी आदेश दिया है.
6 जून 2017 को अहमदाबाद शहर के ओढव इलाके में बेला पार्क स्थित एक घर से असहनीय दुर्गंध आने की खबर मिली थी. जब मकान मालिक दिव्येश मोदी ने मौके पर जाकर जांच की, तो उन्हें वहां दो सड़ी-गली और कीड़ों से भरी लाशें मिलीं. पुलिस तफ्तीश में सामने आया कि ये लाशें उनके किराएदार विपुल मोदी और कंचनबेन मोदी की थीं. ओढव पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड का मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी.
कोर्ट केस के दौरान सरकारी वकील ने पूरी कहानी सामने रखी थी. उनके मुताबिक, मृतक विपुलभाई की पत्नी अपनी सास कंचनबेन के साथ श्रीराम हॉस्पिटल में दवा लेने जाती थी. वहां आरोपी बलदेव चौहान कंपाउंडर की नौकरी करता था और हॉस्पिटल में ही दोनों की जान-पहचान हुई. इसके बाद दोनों के बीच लव अफेयर हो गया. जब इसका पता विपुल और उसकी मां कंचनबेन को चला, तो सुजाता को 29 मई 2017 को महाराष्ट्र में उसके मायके भेज दिया गया.
इससे गुस्सा होकर आरोपी बलदेव चौहान 3 जून 2017 की शाम को विपुल के घर पहुंचा. उस समय उसकी मां कंचनबेन घर में अकेली थीं. कंचनबेन से लड़ाई के बाद बलदेव ने कुल्हाड़ी से उनकी हत्या कर दी और लाश को ठिकाने लगाने की कोशिश में जुट गया. हत्या के बाद आरोपी रात में वहीं रुक गया. जब रात करीब 10 बजे विपुल घर लौटा, तो उसने बलदेव को देखकर मां के बारे में पूछा. आरोपी ने बताया कि वह किचन में हैं. जैसे ही विपुल किचन में गया, आरोपी ने उसी कुल्हाड़ी से विपुल के सिर पर वार कर उसे भी मार डाला और लाशों को बाथरूम के पास छोड़कर अगली सुबह भाग गया.
इसी थ्योरी और क्रूरता के आधार पर एडिशनल सेशंस जज बी.बी. जाधव ने आरोपी बलदेव को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी. निचली अदालत ने अपने फैसले में टिप्पणी की थी कि आरोपी का कृत्य इतना क्रूर और घिनौना था कि उम्रकैद की सजा देना नाकाफी होगा.
जब यह मामला गुजरात हाई कोर्ट पहुंचा, तो जांच और सबूतों में कई बड़ी खामियां उजागर हुईं. केस की मुख्य गवाह और मृतक की पत्नी कोर्ट में अपने बयान से पलट गईं थीं. प्रॉसिक्यूशन कोर्ट के सामने दोनों के बीच किसी भी तरह का प्रेम संबंध साबित करने में नाकाम रहा, जिससे हत्या का मुख्य मोटिव ही कमजोर पड़ गया.
कोर्ट ने पाया कि सीसीटीवी फुटेज में आरोपी का चेहरा साफ तौर पर नजर नहीं आ रहा था. वहीं, हत्या में इस्तेमाल हथियार की बरामदगी की प्रक्रिया में भी कई कानूनी खामियां थीं.
हाई कोर्ट की बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जुर्म भले ही कितना भी गंभीर क्यों न हो, अगर पुलिस और प्रॉसिक्यूशन सबूतों की चेन को पूरी तरह से साबित नहीं कर पाते हैं, तो केवल शक के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.
याचिकाकर्ता के वकील एल.बी. डाभी ने अदालत में दलील दी कि यह पूरा मामला सिर्फ कयासों और परिस्थितियों पर टिका था. कानून का बुनियादी उसूल है कि खासकर मौत की सजा जैसे मामलों में सबूतों का स्तर बेहद सख्त और निर्विवाद होना चाहिए. क्योंकि इस मामले में सबूतों की कड़ी कई जगहों पर टूटी हुई थी, इसलिए हाई कोर्ट का आरोपी को बरी करने का फैसला न्यायसंगत है.
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