नई दिल्ली ,15 अपै्रल ,। मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव, खासकर इजराइल और ईरान से जुड़े संघर्ष के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संकट के संकेत गहराने लगे हैं। इसी पर चिंता जताते हुए वर्ल्ड बैंक के प्रमुख अजय बंगा ने आगाह किया है कि दुनिया एक लंबे और गंभीर रोजगार संकट की ओर बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में करोड़ों लोग बेरोजगारी की चपेट में आ सकते हैं।
1.2 अरब लोगों के सामने रोजगार की चुनौती
अजय बंगा के मुताबिक, अगले 10 से 15 वर्षों में विकासशील देशों में करीब 1.2 अरब लोग कामकाजी उम्र में प्रवेश करेंगे, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में केवल 40 करोड़ नई नौकरियां ही सृजित हो पाएंगी। यानी लगभग 80 करोड़ नौकरियों की भारी कमी सामने आ सकती है। उन्होंने शॉर्ट-वेलोसिटी साइकल का जिक्र करते हुए कहा कि नीति-निर्माता तात्कालिक भू-राजनीतिक संकटों में उलझकर दीर्घकालिक समस्याओं—जैसे रोजगार सृजन—को नजरअंदाज कर रहे हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर और बेसिक सुविधाओं पर जोर
वर्ल्ड बैंक प्रमुख ने कहा कि सरकारों को रोजगार के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं—जैसे स्वच्छ पानी, बिजली और इंफ्रास्ट्रक्चर—पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा। चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा कि यदि रोजगार के अवसर नहीं बढ़े, तो अवैध प्रवासन और सामाजिक अस्थिरता में वृद्धि हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि 2025 तक दुनियाभर में 11.7 करोड़ से अधिक लोग विस्थापन का सामना कर चुके हैं।
प्राइवेट निवेश की अहम भूमिका
वर्ल्ड बैंक ने विकासशील देशों में निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई सुधारों पर जोर दिया है। इनमें व्यापार नियमों को सरल बनाना, श्रम और भूमि कानूनों में सुधार, लॉजिस्टिक्स को बेहतर करना और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण शामिल है। बंगा ने उदाहरण देते हुए कहा कि रिलायंस इंडस्ट्रीज और महिंद्रा ग्रुप जैसी भारतीय कंपनियां वैश्विक स्तर पर तेजी से विस्तार कर रही हैं। वहीं, डांगोटे ग्रुप भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा है।
पानी और बिजली तक पहुंच बढ़ाने का लक्ष्य
वर्ल्ड बैंक का लक्ष्य एक अरब लोगों तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाना और खासकर अफ्रीका में करोड़ों लोगों को बिजली उपलब्ध कराना है। अजय बंगा ने कहा कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकारों, विकास बैंकों और निजी निवेशकों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल संयुक्त प्रयासों के जरिए ही दुनिया मौजूदा आर्थिक दबावों और भविष्य के संभावित संकटों का प्रभावी ढंग से सामना कर सकती है।
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