नई दिल्ली ,19 अपै्रल , । स्मार्टफोन यूजर्स और मोबाइल कंपनियों के लिए एक अहम खबर है। भारत सरकार ने स्मार्टफोन्स में आधार ऐप को अनिवार्य रूप से प्री-इंस्टॉल करने के अपने प्रस्ताव को अब आधिकारिक तौर पर वापस लेने का फैसला किया है। इसका मतलब है कि अब एप्पल, सैमसंग और अन्य स्मार्टफोन कंपनियों को भारत में बिकने वाले अपने मोबाइल फोन्स में पहले से आधार ऐप डालकर देने की कोई जरूरत नहीं होगी। दिग्गज स्मार्टफोन कंपनियों के भारी विरोध के बाद एक सरकारी संस्था ने स्पष्ट किया है कि भारत सरकार अब इस प्रस्ताव पर आगे विचार नहीं करेगी।
ढ्ढञ्ज मंत्रालय ने खारिज किया ढ्ढष्ठ्रढ्ढ का प्रस्ताव
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आधार का संचालन करने वाली सरकारी संस्था यूआईडीएआई (ढ्ढष्ठ्रढ्ढ) ने इसी साल जनवरी में आईटी मंत्रालय से संपर्क साधा था। यूआईडीएआई ने मंत्रालय से एप्पल, गूगल और अन्य प्रमुख स्मार्टफोन निर्माताओं के साथ बातचीत कर आधार ऐप को फोन में प्री-इंस्टॉल करना अनिवार्य बनाने की मांग की थी। हालांकि, अब ढ्ढष्ठ्रढ्ढ ने अपने एक बयान में स्पष्ट कर दिया है कि आईटी मंत्रालय ने इस प्रस्ताव की गहन समीक्षा की है और वह स्मार्टफोन पर इस ऐप को पहले से इंस्टॉल करना अनिवार्य बनाने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है। गौरतलब है कि देश के करीब 1.34 अरब लोगों के पास 12 अंकों का यह यूनिक आइडेंटिटी नंबर है, जिसका इस्तेमाल बैंकिंग से लेकर एयरपोर्ट पर फास्ट एंट्री तक में किया जाता है।
दो साल में छठी बार सरकार का प्रयास हुआ फेल
यह कोई पहला मौका नहीं है जब सरकार ने मोबाइल फोन में किसी सरकारी ऐप को अनिवार्य करने की कोशिश की हो। जानकारी के अनुसार, पिछले दो सालों में यह छठा मौका था जब सरकार की ओर से फोन पर किसी सरकारी ऐप को पहले से इंस्टॉल करने की मांग उठाई गई थी। हालांकि, मोबाइल कंपनियों ने एकजुट होकर सरकार के इन सभी छह प्रयासों का कड़ा विरोध किया है। ढ्ढष्ठ्रढ्ढ का कहना है कि आईटी मंत्रालय ने इस आधार प्री-इंस्टॉलेशन प्रस्ताव को पूरी तरह से रद्द करने का अंतिम फैसला लेने से पहले इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग के सभी प्रमुख स्टेकहोल्डर्स के साथ विस्तार से परामर्श किया था।
कंपनियों ने दिया सुरक्षा और बढ़ती लागत का हवाला
आधार प्रीलोड का यह प्रस्ताव मिलते ही स्मार्टफोन बनाने वाली दिग्गज कंपनियों में खलबली मच गई थी। कंपनियों ने सरकार के सामने डिवाइस की सुरक्षा और सॉफ्टवेयर की कम्पैटिबिलिटी को लेकर गंभीर चिंताएं जाहिर कीं। इसके अलावा, मोबाइल निर्माताओं का सबसे बड़ा तर्क उत्पादन लागत (प्रोडक्शन कॉस्ट) बढऩे को लेकर था। कंपनियों का कहना था कि इस नियम के लागू होने से उन्हें भारतीय बाजार और निर्यात किए जाने वाले बाजारों के लिए अलग-अलग मैन्युफैक्चरिंग लाइनें लगानी पड़ेंगी, जिससे उनका खर्च काफी बढ़ जाएगा। विशेष रूप से एप्पल और सैमसंग जैसी बड़ी कंपनियों ने इस प्रस्ताव को लेकर डिवाइस की सेफ्टी और सिक्योरिटी से जुड़े कई अहम सवाल उठाए थे, जिसके बाद आखिरकार सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े।
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