नई दिल्ली ,19 अपै्रल ,। प्राइवेट नौकरी करने वाले लाखों कर्मचारियों के लिए एक बड़ी और राहत भरी खबर सामने आ रही है। केंद्र सरकार जल्द ही प्रोविडेंट फंड (क्कस्न) कवरेज के लिए तय की गई बेसिक सैलरी लिमिट को भारी मार्जिन से बढ़ाने पर विचार कर रही है। मौजूदा समय में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (श्वक्कस्नह्र) के तहत अनिवार्य पीएफ कटौती के लिए वेतन सीमा 15,000 रुपये प्रति माह तय है, जिसे अब बढ़ाकर 25,000 से 30,000 रुपये तक किया जा सकता है। श्रम और रोजगार मंत्रालय में इस लंबे समय से लटके प्रस्ताव पर अब तेजी से काम शुरू हो गया है, जिससे आने वाले समय में देश के एक बड़े वर्कफोर्स को रिटायरमेंट फंड और सामाजिक सुरक्षा का सीधा लाभ मिल सकेगा।
क्यों पड़ी इस बड़े बदलाव की जरूरत?
पीएफ लिमिट बढ़ाने के इस बड़े फैसले पर पुनर्विचार की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि हाल के दिनों में, खासकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (हृष्टक्र) में, औद्योगिक और प्राइवेट कर्मचारियों के वेतन में अच्छी खासी बढ़ोतरी देखी गई है। इस सैलरी हाइक के कारण कई कुशल कर्मचारी 15,000 रुपये की सीमा को पार कर गए हैं और तकनीकी रूप से अनिवार्य ईपीएफओ कवरेज के दायरे से बाहर होने के खतरे का सामना कर रहे हैं। सरकार का मानना है कि अगर समय रहते यह लिमिट नहीं बढ़ाई गई, तो ‘यूनिवर्सल सोशल सिक्योरिटीÓ यानी सभी को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने का लक्ष्य अधूरा रह जाएगा।
ईएसआईसी (श्वस्ढ्ढष्ट) की लिमिट भी बढ़ाने की है तैयारी
ईपीएफओ के साथ-साथ सरकार कर्मचारी राज्य बीमा निगम (श्वस्ढ्ढष्ट) के तहत भी वेतन सीमा को बढ़ाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। फिलहाल ईएसआईसी के तहत वेतन सीमा 21,000 रुपये प्रति माह है। वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि व्यापार करने में आसानी (श्वड्डह्यद्ग शद्घ ष्ठशद्बठ्ठद्द क्चह्वह्यद्बठ्ठद्गह्यह्य) को बढ़ावा देने और नियमों के बेहतर पालन के लिए ईपीएफओ और ईएसआईसी, दोनों योजनाओं की वेतन सीमा को एक समान स्तर पर लाने की योजना है। श्रम मंत्रालय इसके लिए जल्द ही कंपनियों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ विस्तृत चर्चा शुरू करने जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी का दिखा असर
आपको बता दें कि ईपीएफओ की सैलरी लिमिट में आखिरी बार बदलाव एक दशक पहले साल 2014 में किया गया था, तब इसे 6,500 रुपये से बढ़ाकर 15,000 रुपये प्रति माह किया गया था। इस बार लिमिट बढ़ाने की प्रक्रिया में तेजी आने का एक बड़ा कारण सुप्रीम कोर्ट की वह हालिया चेतावनी भी है, जिसमें कोर्ट ने महंगाई और बढ़ती वेतन दरों के हिसाब से इस सीमा को अपडेट करने पर जोर दिया था। कोर्ट ने साफ कहा था कि मौजूदा सीमा के कारण वर्कफोर्स का एक बड़ा हिस्सा सामाजिक सुरक्षा से वंचित हो रहा है। हालांकि, लिमिट बढऩे से नियोक्ताओं (कंपनियों) पर पीएफ योगदान का वित्तीय दबाव काफी बढ़ेगा, इसीलिए सरकार कोई भी औपचारिक प्रस्ताव पेश करने से पहले हर पहलू पर सावधानी से विचार कर रही है।
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