( एक विश्लेषण)
अजय दीक्षित
लोकसभा सरकार द्वारा पेश महिला आरक्षण, परिसीमन संविधान संशोधन बिल पारित नहीं हो सका है क्योंकि सरकार दो तिहाई समर्थन नहीं जुटा सकी इसलिए 298 मत लाकर गिर गया। विपक्ष ने कोई सहयोग नहीं किया कांग्रेस,सपा, डीएमके, तुड़मूल कांग्रेस, बीजेडी, सीपीएम, सीपीई, क्रस्क्क, सहित डालो विरोध में 230 का अकड़ा जूता लिया जबकि सरकार को 336 मतों की आवश्यकता थी।
इससे पहले लोकसभा में जमकर बहस हुई।बिल केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रस्तुत किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, निशिकांत दुबे, के सी वेणुगोपाल,आदि नेताओं ने भाग लिया। इस बिल के गिरने से सरकार अचरज में नहीं है उसे पहले ही मालूम था।इसी लिए उसने जो बिल का प्रारूप पेश किया वह महिला आरक्षण तो था ही था बल्कि सरकार की मनसा परिसीमन बिल की अधिक थी ।2014 में जब भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र मोदी सरकार आई है।12 वर्ष में सत्ता और विपक्ष में कटुता इतनी बढ़ गई है कि राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात भी नहीं होती है।जिस तरह से राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खडग़े, और अन्य कांग्रेस नेता आरोप लगा ते रहते हैं कि भारत लोकतांत्रिक संस्थाओं को हाइजैक कर लिया है। सर्वोच्च न्यायालय से लेकर चुनाव आयोग तक कांग्रेस ने निष्पक्षता के कटघरे खड़ा कर दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि श्वष्ठ, सीबीआई,हृष्टक्रञ्जश्व,हृढ्ढ्र, आदि को भी कांग्रेस नेताओं के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है। राज्यों के विधानसभा चुनाव में आयोग की भूमिका को संदेहास्पद मानती है यहां तक कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला,चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ भी महायोग का नोटिस दिया जा चुका है। अन्य पार्टियां जैसे तुड़मूल कांग्रेस, बीजेडी, सीपीएम, सीपीई, क्रस्क्क, सपा, डीएमके, भारतीय जनता पार्टी को दुश्मन मानती है। परिसीमन बिल में मुख्य अपत्ति यह थी सरकार कैसे तय कर रही है क्योंकि यह तो चुनाव आयोग या परिसीमन आयोग को निर्णय करना चाहिए वह भी काफी एक्सरसाइज के बाद जबकि बिल में लिखा गया लोकसभा संख्या 850 होगी जिसमें से 35 यूनियन टेरोटरी के लिए आरक्षित होंगी।बिल राज्य बार पचास फीसदी सीट लोकसभा में बढ़ाने का प्रस्ताव था इसी प्रकार राज्यों की विधानसभा सीटों बढ़ेगी। हालांकि दक्षिण भारत के राज्यों में 129 के बजाय 195 सीट का प्रस्ताव था आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, में 24 फीसदी सीट तय की गई जो वर्तमान से कुछ ही अधिक है। लेकिन विपक्ष की आपत्ति उत्तर प्रदेश में 120, महाराष्ट्र में 78, मध्य प्रदेश में 59,इसी प्रकार राजस्थान, दिल्ली, बिहार, गुजरात, हरियाणा,को लेकर थी।
लेकिन समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने सदन में कह दिया कि हम इस बिल विरोध करेंगे चाहे हृष्ठ्र किसी महिला तो ही प्रधानमंत्री बना दे । राहुल गांधी ने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ही यह कह कर भाषण दिया कि महिला आरक्षण तो बहाना है असली बात तो परिसीमन की है। लेकिन प्रस्ताव कोई कमी नहीं थी ।
कुल मिलाकर नरेंद्र मोदी की सरकार और भारतीय जनता पार्टी विपक्ष से कोई उम्मीद नहीं रखे। कांग्रेस और अन्य पार्टियां की पीड़ा है कि अब गिने चुने राज्य रहगये है जहां सरकार अन्य पार्टियां की है जिनमें झारखंड, जम्मू कश्मीर, हिमाचल, कर्नाटक, ही है।
ये पहला मौका जब विपक्ष एक जुट हुआ है क्योंकि 12 वर्ष में मोदी सरकार ने कभी भी लोकसभा या राज्यसभा में बिल गिरने नहीं दिया है यहां तक कि जम्मू कश्मीर से संविधान की अनुच्छेद 370 पर भी सरकार हारी नहीं थी चाहे वह जीएसटी का मामला हो।
12 वर्ष जिस तरह मोदी सरकार ने कार्य ही नहीं किया बल्कि राज्य विधानसभा चुनाव में दो बार उत्तर प्रदेश,तीन बार बिहार,तीन बार मध्यप्रदेश,दो बार राजस्थान,तीन बार गुजरात,तीन बार हरियाणा,तीन बार उत्तराखंड,दो बार छत्तीसगढ़, ओडिशा,दो बार महाराष्ट्र,सहित 75 चुनाव जीते हैं बस यही कसक कांग्रेस को खाए जा रही है। सपा, डीएमके, तुड़मूल कांग्रेस, बीजेडी, सीपीएम, सीपीई,भी इसी कसक में जले भुजे जा रहे हैं।
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