प्रयागराज 22 April, (Rns): इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक भरण-पोषण (मेंटेनेंस) मामले की सुनवाई करते हुए एक बेहद अहम और सख्त टिप्पणी की है। हाई कोर्ट ने पति द्वारा दाखिल की गई याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट रूप से कहा है कि जो पुरुष यह सोचते हैं कि वैवाहिक जीवन में अनबन होने पर वे अपनी पत्नी और बच्चों का खर्च नहीं उठा पाएंगे, उन्हें शुरुआत में ही शादी करने से बचना चाहिए। अदालत का यह कड़ा रुख उन मामलों के लिए एक नजीर है जहां पति अपनी जिम्मेदारियों से भागने का प्रयास करते हैं।
खराब आर्थिक स्थिति का बहाना नहीं चलेगा
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी पुरुष अपनी पत्नी को भरण-पोषण देने की जिम्मेदारी से बचने के लिए अपनी खराब आर्थिक स्थिति का बहाना नहीं बना सकता। अदालत ने कहा कि एक बार जब कोई पुरुष किसी महिला के साथ विवाह के बंधन में बंध जाता है, तो कानून के तहत उस महिला का भरण-पोषण करना उसकी अनिवार्य जिम्मेदारी बन जाती है। इसी कड़ी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने पति तेज बहादुर की अपील को सिरे से खारिज कर दिया।
प्रयागराज फैमिली कोर्ट के आदेश को दी गई थी चुनौती
यह पूरा मामला प्रयागराज फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए एक आदेश से जुड़ा हुआ है। पति ने हाई कोर्ट में फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। प्रयागराज फैमिली कोर्ट के एडिशनल प्रिंसिपल जज ने हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 24 के तहत पत्नी द्वारा दायर आवेदन पर यह आदेश सुनाया था। पत्नी ने मुकदमा लंबित रहने तक गुजारा भत्ता पाने के लिए यह फाइल किया था। इस पर संज्ञान लेते हुए फैमिली कोर्ट ने वैवाहिक विवाद लंबित रहने के दौरान पति को निर्देश दिया था कि वह अपनी पत्नी को भरण-पोषण के रूप में चार हजार रुपये प्रति माह दे। इसी आदेश को पति ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
वर्तमान समय में चार हजार रुपये का गुजारा भत्ता ज्यादा नहीं
हाई कोर्ट में अपील के दौरान पति के वकील ने दलील दी कि उनके मुवक्किल की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और ट्रायल कोर्ट ने इस पहलू पर पर्याप्त विचार नहीं किया। हालांकि, मामले की गहराई से सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने सभी तथ्यों और दोनों पक्षों के तर्कों को भली-भांति परखा था। कोर्ट ने पत्नी के उस बयान पर भी गौर किया जिसमें उसने बताया था कि वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है, बच्चों का पालन-पोषण अकेले कर रही है और उसके पास कमाई का कोई स्वतंत्र जरिया नहीं है। सभी दलीलों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आज के महंगाई के दौर में जीवन यापन के लिए चार हजार रुपये की रकम न तो बहुत ज्यादा है और न ही इसे पति की क्षमता से बाहर माना जा सकता है। अदालत ने दोहराया कि विवाह के बाद भरण-पोषण एक कानूनी बाध्यता है, जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

