नई दिल्ली ,27 अपै्रल ,। गर्मी के बढ़ते प्रकोप के बीच जहां लोग घरों में रहकर ऑनलाइन ग्रॉसरी और फूड ऑर्डर करना पसंद कर रहे हैं, वहीं डिलीवरी करने वाले गिग वर्कर्स तेज धूप और लू में लगातार काम करने को मजबूर हैं। मिनटों में सुविधा देने वाले ये डिलीवरी पार्टनर्स खुद गंभीर स्वास्थ्य जोखिम झेल रहे हैं, जिसे लेकर अब आवाज उठने लगी है।
इसी मुद्दे पर ढ्ढठ्ठस्रद्बड्डठ्ठ स्नद्गस्रद्गह्म्ड्डह्लद्बशठ्ठ शद्घ ्रश्चश्च-ड्ढड्डह्यद्गस्र ञ्जह्म्ड्डठ्ठह्यश्चशह्म्ह्ल ङ्खशह्म्द्मद्गह्म्ह्य (ढ्ढस्न्रञ्ज) ने केंद्र सरकार से ठोस हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन ने केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्रालय को पत्र लिखकर गिग वर्कर्स के लिए सख्त सुरक्षा मानक लागू करने की अपील की है।
क्या हैं मुख्य मांगें?
तेजी से बढ़ते तापमान को देखते हुए ढ्ढस्न्रञ्ज ने कई अहम प्रस्ताव रखे हैं:
सवेतन कूलिंग ब्रेक: ढ्ढठ्ठस्रद्बड्ड रूद्गह्लद्गशह्म्शद्यशद्दद्बष्ड्डद्य ष्ठद्गश्चड्डह्म्ह्लद्वद्गठ्ठह्ल द्वारा ऑरेंज या रेड अलर्ट जारी होने पर हर 2 घंटे के काम के बाद कम से कम 20 मिनट का पेड ब्रेक दिया जाए।
पेनल्टी से राहत: गर्मी के कारण काम रोकने या देरी होने पर वर्कर्स की रेटिंग कम न हो और उनकी आईडी ब्लॉक न की जाए।
जरूरी सुविधाएं: ऐप कंपनियां पीने का पानी, ह्रक्रस् और कूलिंग सेंटर की जानकारी ऐप में उपलब्ध कराएं।
इमरजेंसी फीचर: ऐप में ‘हीट डिस्ट्रेसÓ बटन हो, जिससे जरूरत पडऩे पर तुरंत मेडिकल सहायता मिल सके।
कानूनी प्रावधान की मांग
संगठन ने ष्टशस्रद्ग शठ्ठ स्शष्द्बड्डद्य स्द्गष्ह्वह्म्द्बह्ल4, 2020 के तहत इन सुरक्षा उपायों को लागू करने की मांग की है। साथ ही हृड्डह्लद्बशठ्ठड्डद्य ष्ठद्बह्यड्डह्यह्लद्गह्म् रूड्डठ्ठड्डद्दद्गद्वद्गठ्ठह्ल ्रह्वह्लद्धशह्म्द्बह्ल4 की मौजूदा एडवाइजरी को अनिवार्य नियमों में बदलने की अपील की गई है।
एल्गोरिदम के दबाव में काम
ढ्ढस्न्रञ्ज के राष्ट्रीय महासचिव स्द्धड्डद्बद्म स्ड्डद्यड्डह्वस्रस्रद्बठ्ठ का कहना है कि डिलीवरी और राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म्स के एल्गोरिदम का दबाव इतना अधिक होता है कि वर्कर्स भीषण गर्मी में भी काम करने को मजबूर रहते हैं। इससे उनकी सेहत पर गंभीर असर पड़ रहा है।
समय की मांग
विशेषज्ञों का मानना है कि देशभर में लगातार बढ़ती गर्मी को देखते हुए सड़क पर काम करने वाले लाखों गिग वर्कर्स के लिए ठोस सुरक्षा उपाय लागू करना बेहद जरूरी हो गया है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार इन मांगों पर कितना और कब तक अमल करती है।
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