-12 दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम का चतुर्थ दिवस आयोजित
अयोध्या 29 अप्रैल (आरएनएस)। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आइक्यूएसी) एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयुक्त तत्वावधान में ” सस्टेनेबल एनवायरमेंटल मैनेजमेंट इंटीग्रेटिंग इंडियन नॉलेज सिस्टम पॉलिसी फ्रेमवर्क एंड टेक्नोलॉजिकल इन्नोवेशंस” विषय पर बारह दिवसीय फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम के चतुर्थ दिवस का सफल आयोजन कुलपति कर्नल डॉ. बिजेंद्र सिंह के निर्देशन में किया गया। यह कार्यक्रम आइक्यूएसी एवं शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के संयुक्त तत्वावधान में संचालित हो रहा है। कार्यक्रम के चतुर्थ दिवस की मुख्य वक्ता डॉ. महिमा चौरसिया, एसोसिएट प्रोफेसर, पर्यावरण विज्ञान विभाग रहीं। सत्र के प्रारंभ में डॉ. मनीषा यादव ने मुख्य वक्ता का स्वागत करते हुए उनका संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया। डॉ. महिमा चौरसिया ने “सस्टेनेबल रिसोर्स मैनेजमेंट थ्रू इंडीजीनस प्रैक्टिस एंड टेक्नोलॉजी ” विषय पर व्याख्यान देते हुए सतत संसाधन प्रबंधन की अवधारणा को समझाया। उन्होंने बताया कि सतत संसाधन प्रबंधन की अवधारणा का विकास 18वीं शताब्दी के आसपास प्रारंभ हुआ, जिसका उद्देश्य प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित एवं दीर्घकालिक उपयोग सुनिश्चित करना है। उन्होंने सतत संसाधन प्रबंधन के अंतर्गत प्राकृतिक एवं मानव संसाधनों के प्रकार, पृथ्वी की जैव-क्षमता तथा प्राकृतिक संसाधनों के महत्व पर प्रकाश डाला। साथ ही, स्वदेशी ज्ञान की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए बताया कि यह ज्ञान स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप, पर्यावरण-अनुकूल एवं सतत विकास के लिए अत्यंत उपयोगी है। पावरप्वाइंट प्रेजेंटेशन में डॉ. महिमा ने राजस्थान के जोहड़ जल संरक्षण प्रणाली, नागालैंड की जाबो कृषि प्रणाली, तथा बिहार की आहर-पाइन प्रणाली जैसे पारंपरिक जल प्रबंधन उपायों के उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने इन प्रणालियों की संरचना, कार्यप्रणाली एवं लाभों को विस्तार से समझाया तथा जल संरक्षण के दस पारंपरिक तरीकों पर भी प्रकाश डाला। डॉ. चौरसिया ने स्वदेशी वन प्रबंधन सामुदायिक वानिकी तथा पश्चिम बंगाल के अरबारी मॉडल और बिश्नोई समुदाय के योगदान को रेखांकित करते हुए बताया कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर्यावरण संरक्षण में अत्यंत महत्वपूर्ण है। भूमि संसाधन प्रबंधन के अंतर्गत उन्होंने फसल चक्र, मिश्रित खेती, जैविक खेती एवं बीज संरक्षण जैसी पारंपरिक तकनीकों की उपयोगिता पर प्रकाश डाला। इसके अतिरिक्त हाइब्रिड सोलर-विंड सिस्टम जैसे आधुनिक तकनीकी नवाचारों के माध्यम से सतत ऊर्जा प्रबंधन के महत्व को भी स्पष्ट किया। डॉ. चौरसिया ने जलवायु परिवर्तन और सतत संसाधन प्रबंधन के बीच संबंध को रेखांकित करते हुए बताया कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का समन्वय ही पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी मार्ग है। कार्यक्रम में विभिन्न संस्थानों के शिक्षकों, शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की तथा विषय से संबंधित प्रश्नों के माध्यम से अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया। अंत में आयोजकों द्वारा मुख्य वक्ता के प्रति आभार व्यक्त किया गया तथा प्रतिभागियों को आगामी सत्रों में सक्रिय भागीदारी हेतु प्रेरित किया गया।
Login
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

