-मेडिकोलीगल कार्य थोपकर हो रही ज्यादती
अयोध्या 6 मई (आरएनएस)। जिला अस्पताल में संविदा (संविदा/आकस्मिक) चिकित्सकों के साथ लगातार ज्यादती हो रही है। शासनादेशों की अनदेखी करते हुए इन डॉक्टरों को जबरन मेडिकोलीगल केस करने पड़ रहे हैं, जबकि यह जिम्मेदारी नियमित सरकारी चिकित्सकों की है। इस मामले में छह आकस्मिक चिकित्सा अधिकारी खुलकर अपनी पीड़ा बयां नहीं कर पा रहे हैं। जिला अस्पताल की इमरजेंसी ओपीडी में कार्यरत संविदा चिकित्सकों से फिलहाल मेडिकोलीगल कार्य कराया जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, शासनादेश स्पष्ट रूप से कहता है कि मेडिकोलीगल कार्य केवल स्थायी नियमित चिकित्सा अधिकारी ही करेंगे। इसके बावजूद नियमित डॉक्टरों द्वारा प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव बनाकर संविदा डॉक्टरों का शोषण किया जा रहा है। संविदा चिकित्सक कम वेतन पर भी दिन-रात बड़ी जिम्मेदारी निभाते हैं, लेकिन उन्हें आज तक नियमित नहीं किया गया है।
प्रभावित डॉक्टरों में डॉक्टर आशीष पाठक, डॉक्टर प्रमोद तिवारी, डॉक्टर आशुतोष प्रताप सिंह, डॉक्टर पंकज कुमार, डॉक्टर विशाल चौधरी और डॉक्टर वीरेंद्र वर्मा शामिल हैं। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकोलीगल कार्य करने के दौरान अक्सर कोर्ट से समन आते हैं। कोर्ट में गवाही देने के लिए उन्हें जाना पड़ता है, जिससे उनकी ड्यूटी प्रभावित होती है। इसके बावजूद न तो अतिरिक्त सुविधाएं दी जा रही हैं और न ही कोई सुरक्षा कवच उपलब्ध कराया जा रहा है। एक संविदा चिकित्सक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हम कम वेतन में 24 घंटे की ड्यूटी देते हैं। इमरजेंसी, ओपीडी, मेडिकोलीगलकृसब काम हमसे ही करवाए जाते हैं। जबकि नियमित डॉक्टर आराम से बैठे रहते हैं। शासनादेश की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। हमारा शोषण बंद होना चाहिए और हमें नियमित किया जाए। चिकित्सा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि मेडिकोलीगल केस संवेदनशील होते हैं। इनमें कानूनी जटिलताएं और दबाव दोनों ज्यादा होते हैं। संविदा डॉक्टरों को जबरन इस कार्य में लगाने से न केवल उनका शोषण हो रहा है, बल्कि मरीजों की बेहतर देखभाल और आपातकालीन सेवाओं पर भी असर पड़ सकता है। जिला अस्पताल में वर्तमान में कुल छह ऐसे आकस्मिक चिकित्सा अधिकारी हैं जो इस ज्यादती का शिकार हो रहे हैं। लंबे समय से नियमितीकरण की मांग को लेकर ये डॉक्टर कई बार प्रशासन को ज्ञापन भी दे चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। स्थानीय चिकित्सा संघों और स्वास्थ्य कर्मचारी संगठनों ने भी इस मुद्दे पर नाराजगी जताई है। उन्होंने मुख्य चिकित्सा अधिकारी और जिला प्रशासन से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है। संगठनों का कहना है कि यदि शासनादेशों का पालन नहीं किया गया तो वे उच्च स्तर पर शिकायत करेंगे।
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

