नई दिल्ली ,13 मई (आरएनएस)। सबरीमला मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिंदू धर्म एक जीवनशैली है और यह आवश्यक नहीं है कि हिंदू धर्म में बने रहने के लिए मंदिर जाना या धार्मिक अनुष्ठान करना अनिवार्य हो.
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, लोग अपनी झोपड़ी में दीपक जलाते हैं, बस इतना ही काफी है. न्यायालय ने हिंदू धर्म की सादगी और समावेशिता पर बल दिया.नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ केरल के सबरीमला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और दाऊदी बोहरा सहित विभिन्न धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर रही है.
पीठ में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, एम एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्य बागची शामिल हैं.
प्रोफेसर जी मोहन गोपाल ने कहा कि वेदों को स्वीकार करने के बारे में मुझसे किसी ने नहीं पूछा और न ही किसी ने ऐसा कहा. मैं वेदों का बहुत सम्मान करता हूं, लेकिन क्या यह सच है कि आज जो लोग हिंदू कहलाते हैं, वे सभी वेदों को आध्यात्मिक और दार्शनिक सभी मामलों में सर्वोच्च अधिकार मानते हैं? उन्होंने आगे कहा, तो इस तरह हम धर्म में समाहित नहीं हुए, बल्कि धर्म ने हमें भस्म कर दिया. हमें संवैधानिक दृष्टिकोण से भी विचार करना होगा कि हमारे पास क्या विकल्प है, क्या अधिकार है ?
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, हिंदू धर्म को जीवन शैली भी कहा जाता है. किसी हिंदू के लिए मंदिर जाना या धार्मिक अनुष्ठान करना अनिवार्य नहीं है. वह फिर भी हिंदू ही रहता है, क्योंकि यह जीवन शैली है. गोपाल ने कहा कि अगर यह संदर्भ निर्णय में शामिल हो जाए तो बड़ी राहत मिलेगी.
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, यह पहले से ही मौजूद है और इस पर किसी निर्णय की आवश्यकता नहीं है.न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, मंदिरों में न जाएं. घर में ऐसी कोई जगह या कमरा न रखें जहां पूजा-अर्चना की जाती हो. फिर भी उनकी मानसिकता ऐसी है कि वे हिंदू हैं. यह जीवन शैली है.
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, लोग अपनी झोपड़ी में दीपक जलाएंगे. बस इतना है. पीठ ने कहा, लोगों को अपने धर्म का पालन करने से कोई नहीं रोक सकता. प्रो. गोपाल ने कहा कि अनुच्छेद 25 इसकी रक्षा करता है, लेकिन हमारा न्यायशास्त्र नहीं करता. उन्होंने कहा, हममें से प्रत्येक व्यक्ति यह तय करता है, जैसा कि मुख्य न्यायाधीश ने सही कहा है कि अगर मैं एक छोटी सी झोपड़ी में दीपक जलाता हूं, तो वही मेरा धर्म है. इसलिए, यह आत्मधर्मवाद है – मैं तय करता हूं कि मेरे लिए क्या पवित्र है और मैं उसका पालन कैसे करता हूं
गोपाल ने तर्क दिया कि पुजारी अपनी अंतरात्मा की स्वतंत्रता का प्रयोग कर रहा है और भक्त भी अपनी अंतरात्मा की स्वतंत्रता का प्रयोग कर रही है, और सवाल यह है कि इसका समाधान कैसे किया जाए? एक अमेरिकी फैसले का हवाला देते हुए, गोपाल ने कहा कि इसका एक सिद्धांत यह है कि आप अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का उपयोग किसी अन्य व्यक्ति की नागरिक स्वतंत्रता को छीनने के लिए नहीं कर सकते.
उन्होंने आगे कहा, मैं स्वयं पर प्रतिबंध लगा सकता हूं, लेकिन दूसरों की नागरिक स्वतंत्रता छीनने के लिए अपनी अंतरात्मा की स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं कर सकता. उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति नागरत्ना द्वारा की गई टिप्पणी के आलोक में हिंदू की परिभाषा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, ताकि न्यायशास्त्र, व्यवहार और संविधान में सामंजस्य स्थापित हो सके.
गोपाल ने कहा कि अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण पाने के लिए संगठित धर्म का हिस्सा होना आवश्यक है – यानी स्थापित सिद्धांतों, प्रथाओं और अनुष्ठानों में विश्वास करना आवश्यक है. मुझे लगता है कि इसमें कुछ छूट दी जानी चाहिए. यह ऐसा हो सकता है, लेकिन यह स्व-ईश्वरवाद भी हो सकता है. इस देश की 80 फीसदी आबादी स्व-ईश्वरवादी है.
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