चेन्नई,15 मई (आरएनएस)। तमिलनाडु में नेता प्रतिपक्ष और द्रविड़ मुनेत्र कझगम (द्रमुक) नेता उदयनिधि स्टालिन ने विधानसभा में सनातन धर्म को समाप्त करने संबंधी अपनी टिप्पणी पर उठे नए विवाद के बीच कहा कि, उनका आशय उस व्यवस्था को खत्म करने से था, जो लोगों को ऊंची और नीची जातियों में बांटती है.
उन्होंने कहा कि, सनातन के बारे में उनके जो विचार हैं, उस पर किसी भी आलोचना से वे नहीं डरेंगे. 17वीं तमिलनाडु विधानसभा में अपने पहले भाषण के दौरान, एम के स्टालिन के बेटे और नेता विपक्ष बने उदयनिधि स्टालिन ने जोर देकर कहा था कि सनातन धर्म को, जिसे उन्होंने बांटने वाला बताया, खत्म कर देना चाहिए. इसके बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेताओं ने उनके भाषण पर कड़ी प्रतिक्रिया दी.
इसे देखते हुए, उदयनिधि ने अपनी बातों पर सफाई दी है. अपने एक्स पेज पर उन्होंने कहा, जब मैंने तमिलनाडु विधानसभा में बात की थी, तो मैंने खास तौर पर कहा था कि सनातन धर्म, जो लोगों को बांटता है, उसे जरूर खत्म कर देना चाहिए. कुछ लोग इसके लिए मेरी बुराई कर रहे हैं. लेकिन, मैं ऐसी चीजों से डरने वाला इंसान नहीं हूं.
उन्होंने कहा कि, द्रविड़ आंदोलन खुद विरोध के बीच ही आगे बढ़ा था. उसी भावना से, मैं एक छोटी सी बात साफ करना चाहता हूं, सनातन को खत्म करने की वकालत करने का मतलब यह नहीं है कि लोगों को मंदिर जाना बंद कर देना चाहिए. इसका मतलब है कि सभी को बराबर अधिकार मिलने चाहिए. सिर्फ मंदिरों में ही नहीं, बल्कि पूरे समाज में भी.
उदयनिधि स्टालिन ने कहा, मैंने लोगों को ऊंची जातियों और छोटी जातियों में बांटने की प्रथा को खत्म करने की बात कही थी. मैंने तो सिर्फ पेरियार, अंबेडकर, अन्ना और कलैगनार के बताए सिद्धांतों को ही कहा था. हम किसी के धार्मिक विश्वासों के खिलाफ नहीं हैं; लेकिन, हम गैर-बराबरी और जुल्म का जोरदार विरोध करेंगे… जैसा कि वल्लुवर ने कहा था, जन्म से सभी जीव बराबर होते हैं…यही हमारा रास्ता है.
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