—- कागज़ों पर उगा 39 लाख पौधों का जंगल, वन विभाग के महाभियान पर उठे सबसे बड़े सवाल।
कुशीनगर, 15 मई (आरएनएस)। जनपद में वृक्षारोपण महाभियान- 2025, सरकारी उपलब्धि कम और गंभीर सवालों का विषय ज्यादा बन गया है। करोड़ों रुपये खर्च कर जनपदवासियों को हरियाली का जो सपना सरकारी फाइलों में दिखाया गया है। उसकी जमीनी हकीकत बिल्कुल इतर है। जिसकी पोल खुद सरकारी बैठकों में खुलने लगी है। ऐसे मे विभाग और जिले के डीएफओ की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वभाविक हैं।
बताते चलें कि बीते दिनो सरकारी समीक्षा बैठक में दावा किया गया कि 9 जुलाई 2025 को जनपद में एक ही दिन में 39 लाख 72 हजार 500 पौधरोपण किए गए। इनमें से वन विभाग द्वारा अकेले 10 लाख 49 हजार 600 पौधे लगाने की बात कही गई। जबकि अन्य 23 विभागों ने मिलकर 29 लाख 22 हजार 900 पौधों का रोपण किया। इतना विशाल आंकड़ा सुनने में किसी रिकॉर्ड से कम नहीं लगता लेकिन अब यही आंकड़ा विभागीय दावों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर रहा है। क्योंकि जिस अभियान को ऐतिहासिक बताया जा रहा है। उसी अभियान की जियो टैगिंग तक पूरी नहीं हो सकी है। बैठक में साफ तौर पर सामने आया कि राजस्व विभाग पौधों की जियो टैगिंग का कार्य अब तक पूरा नहीं कर पाया है। इस पर मुख्य विकास अधिकारी को खुद निर्देश देना पड़ा कि 18 मई 2026 तक जियो टैगिंग शत-प्रतिशत पूरी कराई जाए। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब पौधों की लोकेशन तक तय नहीं है, तो उनकी जीवितता का दावा किस आधार पर किया जा रहा है?
इनसेट– वन विभाग के दावों पर उठे रहे सवाल– पूरा वृक्षारोपण अभियान वन विभाग की अगुवाई में चला। ऐसे में इसकी जवाबदेही सीधे डीएफओ पर आकर टिकती है। सवाल यह है कि क्या इतने बड़े स्तर पर लगाए गए पौधों की नियमित निगरानी हुई? क्या पौधों की सुरक्षा के लिए कोई स्थायी व्यवस्था बनाई गई है ?
कितने पौधे आज भी जीवित हैं? कितने पौधे सिर्फ फाइलों और पोर्टल पर जिंदा हैं? सूत्रों की मानें तो कई स्थानों पर पौधारोपण सिर्फ खानापूर्ति बनकर रह गया। बरसात में गड्ढे खोदे गए, पौधे लगाए गए, फोटो खिंची गयी और फाइल बंद हो गई। कुछ दिनों बाद अधिकांश पौधे सूख गए, लेकिन सरकारी आंकड़ों में
हरियाली लगातार बढ़ती रही है।
इनसेट– हरियाली शो बन कर रह गया है पौधारोपण अभियान– जनपद में हर साल पौधारोपण अभियान को बड़े आयोजन की तरह पेश किया जाता है। मंत्री, अधिकारी, जनप्रतिनिधि फोटो खिंचवाते है। सोशल मीडिया पर पोस्ट डाली जाती हैं और प्रेस नोट जारी होते हैं। लेकिन कुछ महीने बाद उन्हीं स्थानों पर सूखे पौधे, खाली ट्री गार्ड और उजड़ी जमीन दिखाई देती है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पौधों की देखरेख के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति और बजट खर्च होती है। कई जगह तो रोपित पौधों का नामोनिशान तक नहीं बचा है। इसके बावजूद विभागीय रिपोर्टों में उन्हें सुरक्षित और जीवित बताया जाता रहा है।
इनसेट– अभियान की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक– जानकार बताते है कि जियो टैगिंग किसी भी पौधारोपण अभियान की सबसे अहम प्रक्रिया मानी जाती है। इसी से यह साबित होता है कि पौधा वास्तव में कहां लगाया गया और उसकी स्थिति क्या है। लेकिन जब खुद सरकारी बैठक में यह सामने आ गया कि जियो टैगिंग अधूरी है, तो पूरे अभियान की पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब चर्चा इस बात की भी होने लगी है कि कहीं पौधारोपण के नाम पर सिर्फ सरकारी लक्ष्य पूरा करने और बजट खर्च दिखाने का खेल तो नहीं हुआ?
इनसेट– करोड़ों खर्च, जवाबदेही शून्य– वृक्षारोपण अभियान में हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। पौधों की खरीद, गड्ढों की खुदाई, मजदूरी, सिंचाई, सुरक्षा, जियो टैगिंग और निगरानी हर स्तर पर बजट जारी होता है। लेकिन अगर इतने बड़े अभियान के बाद भी पौधों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं है, तो यह सीधे-सीधे प्रशासनिक विफलता मानी जाएगी। सबसे गंभीर सवाल यह है कि क्या कभी किसी अधिकारी ने यह जांचने की कोशिश की कि जिन पौधों का रिकॉर्ड दर्ज या फिर पोर्टल पर अपलोड है, वह वास्तव में जमीन पर मौजूद भी हैं या नहीं?।
इनसेट– आम लोगो पर सख्ती, बड़े खेल पर चुप्पी–
वन विभाग की कार्यशैली को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि कोई गरीब व्यक्ति सूखी लकड़ी काट ले तो विभाग तुरंत कार्रवाई करता है, लेकिन लाखों पौधों के गायब होने और वन भूमि पर कब्जों के मामलों में विभाग की सक्रियता सूरदास की बन जाती है।
इनसेट– वृक्षारोपण की निष्पक्ष जांच– अब तक पांच वर्षो मे हुए पौधरोपण की बात को दरकिनार कर वृक्षारोपण महाभियान- 2025 के आंकड़े पर ही नजर दौडायें तो खुद वन विभाग सवालो के घेरे मे है। सबब यह है कि जनपद में लगाए गए सभी पौधों का भौतिक सत्यापन कराया जाए। जियो टैगिंग डेटा सार्वजनिक किया जाए। पौधों की जीवितता की स्वतंत्र जांच हो, और पूरे अभियान में खर्च हुए बजट का ऑडिट कराया जाए। अगर 39 लाख पौधे सचमुच लगाए गए थे, तो कुशीनगर की जमीन आज भी बंजर क्यों दिख रही है? क्या कुशीनगर में जंगल उगाए गए थेज् या सिर्फ सरकारी फाइलों में हरियाली रंगी गई थी?।
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