जिस कंपनी पर घोटाले का आरोप, उसी पर सरकार मेहरबान क्यों
सुलतानपुर 8 जून (आरएनएस)। उत्तर प्रदेश में गरीब बच्चों और गर्भवती महिलाओं को मिलने वाले पोषण आहार (टीएचआर) को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। आरोप है कि नेफेड और राजस्थान की जेवीएस फूड्स कंपनी के गठजोड़ के चलते प्रदेश के 75 जिलों में पिछले दो महीनों से टेक होम राशन का वितरण प्रभावित रहा, जिससे लाखों लाभार्थियों को पोषण नहीं मिल पाया।
अब इस मामले में नया मोड़ तब आया है जब जेवीएस फूड्स के खिलाफ दर्ज एफआईआर को वापस लेने की तैयारी की खबरें सामने आ रही हैं। यही नहीं जिन आरोपों के आधार पर शासन ने खुद कंपनी के खिलाफ कार्रवाई कराई थी, अब उन्हीं आरोपों को कमजोर बताने की कोशिश हो रही है। आर्थिक अपराध अनुसंधान शाखा ने इस मामले की करीब आठ वर्षों तक जांच की। सूत्रों के मुताबिक शुरुआती जांच में गंभीर अनियमितताओं और ठोस साक्ष्यों का दावा किया गया था, लेकिन अब अचानक कहा जा रहा है कि जांच में पर्याप्त सबूत नहीं मिले। अगर सबूत नहीं थे तो एफआईआर क्यों हुई। अगर घोटाला हुआ था तो कार्रवाई क्यों नहीं। और अगर कार्रवाई सही थी, तो एफआईआर वापसी की तैयारी किस दबाव में?
टीएचआर योजना का मकसद कुपोषित बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं तक पौष्टिक आहार पहुंचाना है। लेकिन आरोप है कि सप्लाई बाधित होने से जमीनी स्तर पर आंगनबाड़ी केंद्रों में राशन नहीं पहुंचा और लाभार्थियों को भारी परेशानी उठानी पड़ी। विपक्षी दल और सामाजिक संगठन सवाल उठा रहे हैं कि आखिर गरीबों के हक से जुड़ी इतनी बड़ी लापरवाही पर सरकार खामोश क्यों है? मामले को लेकर अब स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो रही है। जानकारों का कहना है कि जब शासन, जांच एजेंसियों और सप्लाई सिस्टम तीनों पर सवाल उठ रहे हों, तब पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच जरूरी हो जाती है ताकि यह साफ हो सके कि सप्लाई क्यों रुकी? किसे फायदा पहुंचाया गया? और एफआईआर वापस लेने के पीछे असली वजह क्या है। गरीब बच्चों और माताओं के पोषण से जुड़ा मामला सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संवेदनशील सामाजिक मुद्दा है। ऐसे में अगर दोषियों पर कार्रवाई के बजाय उन्हें राहत देने की तैयारी हो रही है तो यह सरकार की जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। अब देखना होगा कि सरकार इन सवालों का जवाब देती है या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा।
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