नई दिल्ली,13 जून(आरएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सेवा न्यायशास्त्र (सर्विस ज्यूरिसप्रूडेंस) में नौकरी से बर्खास्तगी सबसे गंभीर सजा है. इसका न केवल कर्मचारी पर बल्कि उनके आश्रितों पर भी बेहद बुरा असर पड़ता है. शीर्ष अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसा कोई भी जुर्माना या सजा लगाने से पहले अनुशासनात्मक प्राधिकरण को लापरवाही या कदाचार की प्रकृति और गंभीरता, सेवा की अवधि, पुराना रिकॉर्ड, उम्र और क्या नियोक्ता को कोई वित्तीय नुकसान हुआ है, जैसे कारकों पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन के सिंह की पीठ ने कहा कि नौकरी से बर्खास्तगी आमतौर पर वहीं सही मानी जाती है, जहां कदाचार (गलत व्यवहार या लापरवाही) इतना गंभीर हो कि कर्मचारी को नौकरी पर बनाए रखना पूरी तरह से अनुशासन, विश्वास या संस्था के कामकाज के खिलाफ हो. पीठ ने साफ किया कि भ्रष्टाचार, अवैध उगाही, नैतिक पतन, पैसों का गबन, नियोक्ता को भारी नुकसान पहुंचाने वाले काम, या नौकरी पर बने रहने के लिए पूरी तरह से अयोग्यता दिखाने वाले मामलों का आधार अलग होता है.
पीठ ने 11 जून के अपने फैसले में कहा, हालांकि, जहां कदाचार में भ्रष्टाचार, नैतिक पतन, वित्तीय गबन या नियोक्ता को हुआ कोई साबित नुकसान शामिल नहीं है, और जहां बिना किसी बड़े दाग के लंबी सेवा रही हो, वहां अनुशासनात्मक प्राधिकरण को सावधानीपूर्वक यह जांचना चाहिए कि क्या कोई कम सजा न्याय के उद्देश्यों को पूरा करेगी.
शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणियां महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड के एक कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त करने के 2017 के आदेश को रद्द करते हुए कीं. पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता के खिलाफ साबित हुआ कदाचार (गलत व्यवहार) अनुशासनहीनता, आदेश न मानने (अवज्ञा) और उसके परिणामस्वरूप दस्तावेजों से छेड़छाड़ से जुड़ा है, और अदालत किसी कार्यालय या संस्थान में अनुशासन के महत्व को कम नहीं आंक रही है.
पीठ ने आगे कहा, हालांकि, वर्तमान में सामने आई सामग्री से भ्रष्टाचार, अवैध उगाही, नैतिक पतन, फंड का गबन, नियोक्ता को साबित हुआ कोई वित्तीय नुकसान, सार्वजनिक घोटाला या संस्था की छवि को जनता के बीच बदनाम करने जैसा कोई आचरण नहीं दिखता है. ये आरोप काफी हद तक कार्यालय के आंतरिक कामकाज और सेवा से जुड़े विवादों से पैदा हुए प्रतीत होते हैं और ये सार्वजनिक डोमेन में नहीं आए थे.
पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि सेवा न्यायशास्त्र (सर्विस ज्यूरिसप्रूडेंस) में नौकरी से बर्खास्तगी सबसे कठोर सजा है, जो किसी दोषी कर्मचारी को दी जा सकती है. पीठ ने आगे कहा, यह नियोक्ता और कर्मचारी के रिश्ते को हमेशा के लिए खत्म कर देती है, और आमतौर पर कर्मचारी को उसकी पिछली सेवा के लाभों, जैसे कि रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों से भी वंचित कर देती है. इससे न केवल कर्मचारी की मौजूदा कमाई का जरिया छिन जाता है, बल्कि उस पर निर्भर परिवार के सदस्यों की आजीविका भी बंद हो जाती है.
यह पूरा विवाद अपीलकर्ता के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई से पैदा हुआ था, जो महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड में कार्यरत थीं. यह कार्रवाई 12 जुलाई 2017 को जारी एक आदेश के साथ समाप्त हुई, जिसके तहत उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया और उनके निलंबन (सस्पेंशन) की अवधि को ही सजा मान लिया गया था.
बर्खास्तगी के इस आदेश को बाद में लेबर कोर्ट, इंडस्ट्रियल कोर्ट और हाई कोर्ट ने भी सही ठहराया था. इसके बाद अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट के इसी आदेश के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया था.
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