लेखिका: शर्मिष्ठा मुखर्जी / 25 जून 2026 आरएनएस
भारत में सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता को लेकर चल रही चर्चा के बीच मुझे अपने पिता, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की 2014 में नरेन्द्र मोदी की ऐतिहासिक चुनावी जीत से जुड़ी एक दिलचस्प बात याद आती है। उस समय प्रणब मुखर्जी देश के राष्ट्रपति थे। अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े होने के बावजूद दोनों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध थे, जो लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाते हैं।
लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद नरेन्द्र मोदी राष्ट्रपति भवन में प्रणब मुखर्जी से मिलने पहुंचे। बातचीत के दौरान प्रणब मुखर्जी ने उनसे चुनाव परिणाम का विश्लेषण पूछा। मोदी ने कहा कि लगभग तीन दशक बाद किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिला है। इस पर प्रणब मुखर्जी ने पूछा, “और क्या?” जब मोदी कुछ नहीं बोले तो उन्होंने कहा कि 2014 का चुनाव इसलिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि पहली बार प्रधानमंत्री पद का चेहरा पहले से घोषित था और जनता ने सीधे उसी नेतृत्व के नाम पर मतदान किया।
उनके अनुसार भाजपा को मिला जनादेश केवल पार्टी के पक्ष में नहीं था, बल्कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए जनता का स्पष्ट समर्थन था। इससे पहले अधिकांश चुनावों में प्रधानमंत्री का चयन संसदीय दल, वरिष्ठ नेताओं या गठबंधन की परिस्थितियों के आधार पर होता था। कई बार चुनाव से पहले प्रधानमंत्री का चेहरा घोषित भी नहीं किया जाता था।
2014 से पहले नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति में नए थे। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई थी, लेकिन लोकसभा का यह उनका पहला चुनाव था। पहली बार सांसद बनकर सीधे प्रधानमंत्री पद संभालना भारतीय राजनीति की एक अनोखी घटना थी। संसद भवन की सीढ़ियों पर माथा टेककर प्रवेश करने का उनका दृश्य भी लंबे समय तक लोगों के बीच चर्चा का विषय बना रहा।
किसी भी चुनावी जीत के पीछे अनेक कारण होते हैं। भाजपा का मजबूत संगठन, बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता, समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंच और समय के साथ रणनीति में बदलाव जैसी बातें उसकी सफलता के प्रमुख कारण मानी जाती हैं। हालांकि यह भी माना जाता है कि नरेन्द्र मोदी आज भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान बन चुके हैं।
बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान भी कई मतदाता यह कहते सुनाई दिए कि वे “मोदी को वोट दे रहे हैं”, जबकि चुनाव विधानसभा का था। इससे यह संकेत मिलता है कि कई राज्यों में भी मतदाता पार्टी से अधिक नेतृत्व को महत्व देते हैं।
आज नरेन्द्र मोदी देश के सबसे लंबे समय तक प्रत्यक्ष जनादेश प्राप्त प्रधानमंत्री बन चुके हैं। समर्थकों के अनुसार उन्होंने मजबूत और स्थिर नेतृत्व दिया है, जबकि आलोचक उनकी नीतियों पर सवाल उठाते रहे हैं। लोकतंत्र में दोनों पक्षों का होना स्वाभाविक है।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि पिछले एक दशक में “ब्रांड मोदी” भारतीय राजनीति का एक प्रभावशाली नाम बन चुका है। उन्होंने चुनावी राजनीति की शैली और जनता से संवाद के तरीके को नई दिशा दी है। अब यह समय बताएगा कि जनता द्वारा दिए गए इस विश्वास को वे देश के विकास और लोकतंत्र की मजबूती में किस तरह आगे बढ़ाते हैं।
(लेखिका एक स्तम्भोकार हैं और ‘प्रणब माय फादर: अ डॉटर रिमेंबर्स’ पुस्तीक की लेखिका हैं। वह वर्तमान में ‘प्रणब मुखर्जी लिगेसी फाउंडेशन’ की संचालक हैं।)

