नईदिल्ली,26 जून(आरएनएस)। डिजिटल क्रांति के इस दौर में जहां एक ओर आम जनता का जीवन आसान हुआ है, वहीं दूसरी ओर साइबर अपराध ग्राफ तेजी से ऊपर भागा है. ऑनलाइन निवेश के नाम पर धोखाधड़ी, यूपीआई फ्रॉड, फर्जी बैंकिंग ऐप्स और लोन स्कैम जैसे मामलों में अपराधी अक्सर एक राज्य में बैठकर दूसरे राज्य के निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाते हैं. इस अंतर-राज्यीय चुनौती से निपटने और पीडि़तों को तुरंत न्याय दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने एक क्रांतिकारी और पूरी तरह से स्वचालित कदम उठाया है, जिसे ई-ज़ीरो एफआईआर नाम दिया गया है. देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देशों के बाद अब इस आधुनिक डिजिटल व्यवस्था को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में तेजी से लागू करने की तैयारियां अंतिम चरण में हैं.
आमतौर पर किसी भी अपराध की एफआईआर उसी पुलिस थाने में दर्ज की जाती है, जिसके भौगोलिक क्षेत्राधिकार के अंतर्गत वह घटना हुई हो. साइबर अपराधों के मामले में यह नियम पीडि़तों के लिए बड़ी मुसीबत बन जाता था, क्योंकि स्थानीय पुलिस अक्सर सीमा विवाद या तकनीकी कारणों का हवाला देकर शिकायत दर्ज करने में देरी करती थी.
इस समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए जीरो एफआईआर की अवधारणा को पूरी तरह डिजिटल रूप दिया गया है. अब कोई भी पीडि़त घर बैठे बिना किसी पुलिस स्टेशन के चक्कर काटे ऑनलाइन अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है. इस व्यवस्था के तहत क्षेत्रीय सीमाओं का बंधन पूरी तरह समाप्त हो जाता है.
केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत कार्यरत इंडियन साइबरक्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (आई4सी) इस पूरी प्रक्रिया की रीढ़ है. प्रणाली की प्रमुख कार्यप्रणाली इस प्रकार है.
यदि किसी नागरिक के साथ ?10 लाख या उससे अधिक की वित्तीय धोखाधड़ी होती है, तो नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (एनसीआरपी) या राष्ट्रीय हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत दर्ज होते ही सिस्टम इसे स्वचालित रूप से ई-ज़ीरो एफआईआर में तब्दील कर देता है.
शिकायत दर्ज होने के तुरंत बाद पीडि़त के रजिस्टर्ड ईमेल और व्हाट्सएप पर प्रमाणित डिजिटल एफआईआर की कॉपी भेज दी जाती है.
साइबर अपराधों में ठगी के शुरुआती 1 से 3 घंटे सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं. इस प्रणाली के जरिए दिल्ली स्थित केंद्रीय ई-क्राइम स्टेशन से सीधे संबंधित बैंक और क्षेत्रीय पुलिस को अलर्ट जाता है, जिससे ठगों के बैंक खातों को तुरंत फ्रीज कर पैसा ट्रांसफर होने से रोक लिया जाता है.
इस डिजिटल एफआईआर को कानूनी रूप से मान्य और चार्जशीट के योग्य बनाने के लिए सरकार ने सुरक्षात्मक नियम भी जोड़े हैं. ई-ज़ीरो एफआईआर दर्ज होने के बाद शिकायतकर्ता को 3 दिनों के भीतर संबंधित साइबर पुलिस स्टेशन जाकर अपने बयानों और जमा किए गए डिजिटल दस्तावेजों का भौतिक सत्यापन कराना अनिवार्य है. इसके बाद ही यह अस्थायी शिकायत एक नियमित एफआईआर में तब्दील होती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यवस्था से राज्यों की पुलिस और बैंकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा, जिससे न केवल अपराधियों को पकडऩा आसान होगा बल्कि पीडि़तों की डूबी हुई रकम वापस मिलने की संभावना भी कई गुना बढ़ जाएगी.
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