नई दिल्ली,05 जुलाई(आरएनएस)। संसद के आगामी मानसून सत्र में केंद्र सरकार एक बार फिर महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पेश कर सकती है। हालांकि, वर्तमान संसदीय गणित को देखें तो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) अभी भी लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से पीछे है। ऐसे में इन विधेयकों का भविष्य सहयोगी दलों, निर्दलीय सदस्यों और अन्य दलों के संभावित समर्थन पर निर्भर करेगा।
दरअसल, संविधान संशोधन विधेयकों को पारित कराने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई मतों की आवश्यकता होती है। महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव इसी श्रेणी में आते हैं।
वर्तमान में लोकसभा की कुल प्रभावी सदस्य संख्या 540 है, जबकि तीन सीटें रिक्त हैं। ऐसे में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 360 बनता है।
राजग के पास इस समय कुल 319 सांसद हैं। इनमें भारतीय जनता पार्टी के 240 और सहयोगी दलों के 79 सांसद शामिल हैं। इस संख्या में शिवसेना तथा तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों का भी समर्थन जोड़ा गया है, हालांकि इनके दल-बदल संबंधी मामलों पर लोकसभा अध्यक्ष का अंतिम निर्णय अभी शेष है।
मौजूदा स्थिति में राजग को दो-तिहाई बहुमत के लिए अभी भी 41 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होगी।
राज्यसभा की कुल सदस्य संख्या 245 है। यहां दो-तिहाई बहुमत के लिए 164 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
राजग के पास फिलहाल 141 सदस्य हैं। यदि 10 मनोनीत तथा निर्दलीय सदस्यों का समर्थन भी मिल जाए तो यह संख्या 151 तक पहुंचेगी। इसके बावजूद आवश्यक बहुमत से 13 सदस्य कम रहेंगे।
ऐसी स्थिति में बीजू जनता दल तथा वाईएसआर कांग्रेस पार्टी जैसे दल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। दोनों दल पहले भी कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर सरकार का समर्थन करते रहे हैं। यदि इनका सहयोग मिलता है तो राजग की संख्या लगभग 160 तक पहुंच सकती है, जो फिर भी आवश्यक बहुमत से कुछ कम रहेगी।
हाल के महीनों में कई राजनीतिक दलों में टूट-फूट के कारण संसदीय समीकरण बदले हैं।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया का दामन थामने और राजग का समर्थन करने की घोषणा की है।
इसी प्रकार शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह लोकसभा सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए हैं।
वहीं, आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसद, जिनमें राघव चड्ढा भी शामिल बताए जा रहे हैं, भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की चर्चा है। इन राजनीतिक घटनाक्रमों ने राजग की ताकत बढ़ाई है, हालांकि इनके औपचारिक संसदीय प्रभाव की प्रक्रिया अलग-अलग मामलों में पूरी होना शेष है।
राजग की नजर अब समाजवादी पार्टी, द्रविड़ मुनेत्र कषगम तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद गुट) जैसे दलों पर भी मानी जा रही है।
राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद द्रविड़ मुनेत्र कषगम और कांग्रेस के संबंधों में दूरी बढ़ी है। यदि भविष्य में इस दल के सांसदों का समर्थन सरकार को मिलता है तो संसदीय गणित में बदलाव संभव है। हालांकि अभी तक इस संबंध में कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।
संविधान संशोधन विधेयकों में दो-तिहाई बहुमत का निर्धारण सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के आधार पर होता है। ऐसे में यदि विपक्ष के कुछ सांसद मतदान के दौरान अनुपस्थित रहते हैं तो प्रभावी सदस्य संख्या घट सकती है और आवश्यक बहुमत का आंकड़ा भी कम हो जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार इस विकल्प पर भी रणनीतिक रूप से विचार कर सकती है।
इस वर्ष अप्रैल में केंद्र सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े तीन विधेयक लेकर आई थी। इनमें से एक संविधान संशोधन विधेयक पर मतदान हुआ, जिसमें पक्ष में 298 और विरोध में 230 मत पड़े। आवश्यक दो-तिहाई समर्थन नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका। इसके बाद सरकार ने शेष दो विधेयक वापस ले लिए थे।
पिछले 12 वर्षों में यह पहला अवसर था जब केंद्र सरकार किसी प्रमुख विधेयक को संसद से पारित कराने में सफल नहीं हो सकी।
मानसून सत्र में यदि सरकार इन विधेयकों को दोबारा पेश करती है तो सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह सहयोगी दलों, निर्दलीय सदस्यों तथा तटस्थ दलों का कितना समर्थन जुटा पाती है। वर्तमान आंकड़ों के आधार पर राजग अभी आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से पीछे है, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों में संभावित बदलाव इस समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं।
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