देहरादून,09 नवंबर (आरएनएस)। राज्य स्थापना की रजत जयंती पर उत्तराखंड साहित्य सम्मेलन और हिमालय विरासत न्यास की ओर से डालनवाला स्थित प्रीतम रोड में काव्य गोष्ठी आयोजित की गई। गोष्ठी में कवि/शायरों ने काव्य का खूब रंग जमाया। शुभारंभ मोनिका मंतशा की सरस्वती वंदना से हुआ। कार्यक्रम अध्यक्ष मीरा नवेली ने पढ़ा कि ‘ये ठौर बड़ा कम बचे, रुके बहाव अब चले, अंजलि भर मोरपंख वैराग्य देकर ही मिले..,अंबिका सिंह रूही ने पढ़ा कि ‘सुनो अहले वतन मिलकर सभी फरियाद जंगल की, परिंदों को रुलाती रहती है अब याद जंगल की..’। परमवीर कौशिक ने ‘लुटते हुए तो देखा लोगों को तीरगी में, तन्हा हमीं लुटे हैं भरपूर रौशनी में..’ सुनाकर वाहवाही लूटी। वीरेन्द्र डंगवाल पार्थ ने ‘सुबह वही है शाम वही है, कृष्ण वही है राम वही है.., नीलम पांडेय नील ने पढ़ा कि ‘मेरी आपत्तियों पर, चुप्पियों की मुहर सजा दो प्रिय.. जीके पिपिल ने ‘अपमान के ज़ख्मों में खून नहीं अश्क़ बहते हैं.., मोनिका मंतशा ने पहाड़ पर अपनी बात कहते हुए कहा कि ‘कैसे कटते हैं ये दिन रात इन पहाड़ों पर, आओ मिलकर के करें बात इन पहाड़ों पर..’,सुनाई। इसके अलावा नवीन आजम, महेंद्र प्रकाशी, दीपक अरोड़ा, नरेंद्र उनियाल, अरविंद शाह, शिवमोहन सिंह, डॉ नीलम प्रभा वर्मा, नरेंद्र शर्मा अमन, सुभाष चंद वर्मा, संगीता शाह, सुलोचना परमार, अरविंद साह, विजयश्री वंदिता, पूनम नैथानी आदि ने भी काव्य पाठ किया। अध्यक्षता मीरा नवेली और संचालन साहित्य सम्मेलन के महामंत्री वीरेंद्र डंगवाल पार्थ ने किया।

