बिलासपुर, 1६ नवम्बर (आरएनएस)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट किया है कि पति को वैवाहिक संबंध बनाने से लगातार रोकना मानसिक क्रुरता की श्रेणी में आता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को पलटते हुए पति की अपील स्वीकार कर तलाक मंजूर कर दिया। न्यायमूर्ति रजनी दुबे और न्यायमूर्ति एके प्रसाद की खंडपीठ ने फैसले में कहा कि पति-पत्नी के बीच 11 वर्ष का अलगाव और पत्नी का दांपत्य संबंध निभाने से साफ इनकार मानसिक उत्पीडऩ माना जाएगा। कोर्ट ने पति को आदेश दिया कि वह दो महीने के भीतर पत्नी को 20 लाख रुपए स्थायी गुजारा भत्ता दे।
मामला क्या था
अंबिकापुर निवासी 45 वर्षीय युवक ने बताया कि उसकी शादी 30 मई 2009 को रायपुर की एक युवती से हुई थी। आरोप है कि विवाह के करीब एक महीने बाद ही पत्नी उसे छोड़कर मायके चली गई और साथ रहने में रुचि नहीं दिखाई। पति का कहना था कि पत्नी दांपत्य कर्तव्यों को निभाने से इनकार करती थी और शारीरिक संबंध बनाने पर आत्महत्या की धमकी तक देती थी। वर्ष 2013 में पत्नी कुछ दिन उसके साथ रही लेकिन तब भी वैवाहिक संबंध स्थापित करने से बचती रही। मई 2014 से वह लगातार मायके में रह रही है और पति के प्रयासों के बावजूद लौटने को तैयार नहीं हुई। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)के तहत तलाक की याचिका दायर की, पर फैमिली कोर्ट ने उसे खारिज कर दिया। इसके बाद पति हाईकोर्ट पहुंचा।
पत्नी का पक्ष
पत्नी ने पति के आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि पति योग-साधना में मग्न रहता था और वैवाहिक जीवन में रुचि नहीं लेता था। उसने यह भी कहा कि पति बच्चे नहीं चाहता था और उसने मानसिक व शारीरिक प्रताडऩा दी। पत्नी ने पहले वैवाहिक अधिकार बहाली की अर्जी लगाई थी, पर बाद में वह वापस ले ली।
हाईकोर्ट का निष्कर्ष
रिकॉर्ड और दोनों पक्षों के बयान देखने के बाद कोर्ट ने पाया कि दोनों 11 साल से अलग रह रहे हैं और पत्नी ने जिरह में स्वयं स्वीकार किया कि वह पति के साथ रहना नहीं चाहती। अदालत ने इसे मानसिक कु्ररता मानते हुए कहा कि रिश्ते में वापसी की संभावना न होना भी तलाक का आधार है। आखिर में हाईकोर्ट ने पति की अपील मंजूर कर तलाक दे दिया।
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