नई दिल्ली ,04 दिसंबर (आरएनएस)। भारत के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने गुरुवार को कहा कि यह सिस्टम का मजाक है. जब उन्हें बताया गया कि 2009 के एसिड अटैक केस का ट्रायल पेंडिंग है. उन्हें यह जानकर हैरानी हुई कि ऐसे भी मामले हैं जहां महिलाओं को एसिड पीने के लिए मजबूर किया गया.
सीजेआई ने ऐसे मामलों में रोजाना ट्रायल का समर्थन किया और महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराधों पर दुख जताते हुए कहा कि किसी भी कोर्ट को उनके प्रति सहानुभूति नहीं रखनी चाहिए.
यह मामला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच के सामने आया. सुनवाई के दौरान, सीजेआई ने एसिड अटैक सर्वाइवर शाहीन मलिक को बेंच के सामने अपनी बात रखने की इजाजत दी. सीजेआई ने कहा, अगर आप कुछ कहना चाहते हैं तो आपका स्वागत है. कृपया कहें. आप इतनी दूर से आए हैं, हम आपको सुनना चाहेंगे.
याचिकाकर्ता, जिसने पीआईएल दायर की है, ने न्याय पाने के अपने बुरे अनुभव के बारे में बताते हुए कहा कि 2009 में उस पर एसिड से हमला हुआ था और 2013 तक न्याय की कोई उम्मीद नहीं जगी.
सीजेआई ने पूछा, क्या आप पर हमला करने वालों को सजा मिली? महिला ने ‘नहीं’ में जवाब दिया और कहा कि दिल्ली के रोहिणी कोर्ट में ट्रायल चल रहा है और यह फाइनल आर्गुमेंट के स्टेज पर है.
बेंच को बताया गया कि ट्रायल हरियाणा से दिल्ली ट्रांसफर कर दिया गया है. सीजेआई ने याचिकाकर्ता से इस मामले में एक आवेदन फाइल करने को कहा और कहा, 2009 का ट्रायल अभी तक पूरा क्यों नहीं हुआ है?
याचिकाकर्ता के वकील ने पीठ को बताया कि मामला शीर्ष अदालत में भी पहुंच गया है. बेंच ने कहा कि इस मामले में हर दिन ट्रायल होना चाहिए, और अगर राष्ट्रीय राजधानी इन चुनौतियों का जवाब नहीं दे सकती, तो देश में कौन देगा.
सीजेआई ने इस मामले में ज्यूडिशियल सिस्टम के रिस्पॉन्स पर अपनी नाराजगी जाहिर की. याचिकाकर्ता ने याद दिलाया कि एक ज्यूडिशियल ऑफिसर डॉ. परमिंदर कौर, जो अभी हरियाणा में पोस्टेड हैं, ने उनका केस फिर से खोलने में मदद की, और तब से वह अपना केस लड़ रही हैं.
महिला ने कहा कि वह न केवल अपनी कानूनी लड़ाई लड़ रही है, बल्कि अन्य एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए भी काम कर रही हैं और इसके लिए उसने सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की है.
उन्होंने कहा कि एसिड अटैक से जलने के निशान उनके चेहरे पर दिख रहे हैं, लेकिन ऐसे मामले भी हैं जब पीडि़तों को एसिड पीने के लिए मजबूर किया जाता है, और उन्हें डिसेबिलिटी पेंशन जैसे कोई फायदे नहीं मिलते. सीजेआई ने कहा कि वह आज उनकी पिटीशन पर नोटिस जारी करेंगे.
सीजेआई ने कहा कि कल रात उसकी याचिका पढ़ते समय वह यह जानकर हैरान रह गए कि पीडि़तों को एसिड पीने के लिए मजबूर किया जा रहा है, क्योंकि उन्होंने ऐसी किसी घटना के बारे में नहीं सुना था. सीजेआई ने कहा, अगर किसी को एसिड पीने के लिए मजबूर किया जाता है तो वह व्यक्ति कैसे जीवित रहेगा?
याचिकाकर्ता ने कहा कि कुछ पीडि़त ऐसे हैं जो चल नहीं सकते, और उन्हें रेगुलर हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ता है, और उनकी फूड पाइप को आर्टिफिशियल फूड पाइप से बदल दिया गया है, और वे खा नहीं पाते.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस याचिका का कोई भी प्रतिवादी विरोध नहीं कर सकता, और सुझाव दिया कि इसे नि:शक्त माना जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि इन घटनाओं को विकलांगता अधिनियम के तहत कवर करना होगा. मेहता ने कहा, आप इसका मतलब निकाल सकते हैं, नहीं तो मैं देखूंगा कि इसमें बदलाव किया जाए.
सीजेआई ने कहा, अगर आपकी तरफ से कोई सकारात्मक कार्रवाई है. कुछ स्पष्टीकरणज्प्लीज़ इस बात पर विचार करें कि इन सभी केस को स्पेशल कोर्ट में ट्रायल किया जाना चाहिए. मेहता इस बात से सहमत थे कि केस को रोजाना बेसिस पर ट्रायल किया जाना चाहिए.
सीजेआई ने कहा कि न्यायिक पक्ष से, वह टाइमलाइन तय कर सकते हैं और हाई कोर्ट को स्पेशल कोर्ट तय करने का निर्देश दे सकते हैं, जिन्हें केंद्र नोटिफाई कर सकता है. सीजेआई ने कहा, यह सिस्टम का मज़ाक है, 2009 का पीडि़तज्
मेहता ने कहा कि आरोपी से उसी बेरहमी से निपटा जाना चाहिए, जिस बेरहमी से उसने यह जुर्म किया है. सीजेआई ने कहा, बिल्कुल, इन लोगों के साथज्किसी भी कोर्ट को हमदर्दी नहीं रखनी चाहिएज्सिस्टम को उनके खिलाफ जवाब देना चाहिएज्
बेंच ने कहा, नोटिस जारी करें, कोर्ट में मौजूद एसजी ने नोटिस स्वीकार कर लिया है. उन्होंने इस याचिका में उठाई गई चिंता भी बताई है. बेंच ने सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को एसिड अटैक पीडि़तों के मामलों में लंबित परीक्षण की डिटेल्स देने का भी निर्देश दिया. एसिड अटैक पीडि़तों के मामलों पर पूरे भारत के डेटा के बारे में, बेंच ने मामले की सुनवाई चार हफ्ते बाद तय की है.
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