नई दिल्ली 06 Dec, : दुनिया के सबसे अमीर लोकतंत्र यानी जी-7 देश और यूरोपीय संघ मिलकर रूस के तेल व्यापार पर अब तक का सबसे बड़ा और निर्णायक प्रहार करने की तैयारी कर रहे हैं। पश्चिमी देश रूसी कच्चे तेल के लिए समुद्री सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की योजना बना रहे हैं। यह कदम पश्चिमी जहाजों और बीमा कंपनियों के लिए रूस के साथ किसी भी तरह का कारोबार करना नामुमकिन बना देगा, जिससे रूस की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ना तय माना जा रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट में छह सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि इस फैसले का सीधा असर ग्रीस, साइप्रस और माल्टा जैसे यूरोपीय देशों के उन जहाजों पर पड़ेगा जो अभी भी रूसी तेल का निर्यात कर रहे हैं।
इस नए और कड़े प्रतिबंध के लागू होते ही मौजूदा ‘प्राइस लिमिट सिस्टम’ खत्म हो जाएगा। इसका मकसद रूस द्वारा पश्चिमी स्वामित्व वाले टैंकरों के जरिए किए जा रहे मुनाफे वाले समुद्री कारोबार को पूरी तरह ठप करना है। गौरतलब है कि रूस अभी भी अपने एक तिहाई से ज्यादा तेल की आपूर्ति पश्चिमी जहाजों और सेवाओं के जरिए करता है, जिसमें से अधिकांश तेल भारत और चीन को भेजा जा रहा है। इन रास्तों के बंद होने से रूस को मजबूरन अपने पुराने और खस्ताहाल ‘शैडो फ्लीट’ (छाया बेड़े) पर पूरी तरह निर्भर होना पड़ेगा। शैडो फ्लीट उन सैकड़ों टैंकरों का एक नेटवर्क है जो प्रतिबंधों से बचने के लिए चोरी-छिपे काम करता है और जिनकी निगरानी करना बेहद मुश्किल है।
इस प्रस्ताव को यूरोपीय संघ के अगले प्रतिबंध पैकेज में शामिल करने पर विचार किया जा रहा है, जिसके 2026 की शुरुआत में आने की उम्मीद है। ब्रुसेल्स इस फैसले को औपचारिक रूप देने से पहले जी-7 की सहमति का इंतजार कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक, ब्रिटिश और अमेरिकी अधिकारी जी-7 की बैठकों में इस बातचीत को तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि, इस पूरे मामले में अंतिम अमेरिकी रुख राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की रणनीति पर निर्भर करेगा। चूंकि ट्रंप फिलहाल यूक्रेन-रूस शांति वार्ता में मध्यस्थता कर रहे हैं और उन्होंने पहले प्राइस लिमिट सिस्टम को और सख्त करने में कम दिलचस्पी दिखाई थी, इसलिए उनका फैसला निर्णायक होगा। यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाती है, तो यह 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से रूसी तेल पर जी-7 और यूरोपीय संघ द्वारा की गई सबसे सख्त कार्रवाई होगी।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर में रूस ने अपने तेल का 38 प्रतिशत हिस्सा जी-7 और यूरोपीय संघ की कंपनियों से जुड़े टैंकरों के जरिए निर्यात किया था। वहीं, प्रतिबंधों से बचने के लिए रूस, ईरान और वेनेजुएला द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ‘शैडो फ्लीट’ में अब 1,423 टैंकर शामिल हो चुके हैं। पश्चिमी सरकारों का तर्क है कि इस कदम का लक्ष्य तेल बाजार में स्थिरता बनाए रखते हुए क्रेमलिन के युद्ध राजस्व (War Revenue) को कम करना है। अगर यह पूर्ण समुद्री प्रतिबंध लागू हो जाता है, तो रूस के पास या तो अपने अवैध बेड़े का विस्तार करने या फिर तेल निर्यात में भारी कटौती करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।

