सुल्तानपुर 9 दिसंबर (आरएनएस)। राजकीय मेडिकल कॉलेज के पिं्रसिपल पर लगे आरोपों को लेकर कुछ पत्रकारों ने पिछले दिनों खबरों के माध्यम से एक तरह से मोर्चा खोल रखा है। लगातार सवाल, रिपोर्टें और चर्चाएँ सब चल रहा है। कॉलेज परिसर से लेकर शहर तक चर्चा यही कि आखिर पिं्रसिपल का जैक कहाँ है, जो न केवल उन्हें हर संकट से बचा लेता है, बल्कि उल्टा परिसर में उनकी हनक और मजबूत होकर लौटती दिखती है। इन सब सवालों के बीच जब पिं्रसिपल से लोकायुक्त जांच की स्थिति जानने का प्रयास किया गया तो उन्होंने बड़ी सहजता से ऐसा जवाब दिया कि पूरा विवाद जैसे मज़ाक बनकर रह गया। हमें क्या पता? मैं तो कॉन्ट्रैक्ट बेस पर हूँ। अपना काम कर रहा हूँ। अगर फालतू बातों का जवाब देने लगूँगा तो जवाब ही देता रह जाऊँगा। आज तक किसी आरोप पर टिप्पणी नहीं की, न अब करूँगा। इन लोगों को जानकारी कहाँ से मिलती है, वही जानें। पिं्रसिपल का यह बयान न सिर्फ आरोपों पर सीधा प्रहार था, बल्कि उन पत्रकारों पर भी एक गहरा तंज था, जो बिना किसी आधिकारिक पुष्टि के जानकार सूत्रों के भरोसे खबरें परोसते रहे। दरअसल जिस लोकायुक्त जांच को लेकर तरह-तरह की कहानियाँ गढ़ी जा रही हैं, उसी पर पिं्रसिपल का यह जवाब कई सवाल खड़े करता है क्या जांच सचमुच आगे बढ़ रही है या केवल कुछ लोगों की कल्पना में ही तेज़ी पकड़ रही है?क्या खबरें तथ्यों पर आधारित थीं या बस सुर्खियों की भूख का शिकार? पत्रकारिता का काम सवाल पूछना है, लेकिन जब जवाब सामने से आए और फिर भी शोर वही बना रहेकृतो तंज खुद-ब-खुद जन्म ले ही लेता है। इस पूरे प्रकरण में पिं्रसिपल के एक सरल से वाक्य ने कहीं न कहीं उस खबर बनाम खबरबाज़ी की सीमा रेखा को भी उजागर कर दिया, जिसे कई लोग आजकल सुविधा के हिसाब से मिटाते बनाते रहते हैं।
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