अजय दीक्षित
बंगाल के तत्कालीन मूर्धन्य साहित्यकार और विद्वान स्व श्री बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1882 में अपनी पुस्तक आनंद मठ में बंगाल में 1770और 1774 के मध्य विकराल ब भीषण अकाल और उसमें ब्रिटिश साम्राज्य की भूमिका का चित्रण किया है और उससे अवतरित हुआ है बंदे मातरम् जो बाद में आजादी के दीवानों और क्रांतिकारी लोगों का उदघोष बन गया था। आनंद मठ नामक पुस्तक में महेंद्र और जीवानंद दो पात्र हैं और वे सत्यानंद के संन्यासी शिष्य हैं। महेंद्र कल्याणी नामक महिला का पति है। घटना बंगाल के मुर्शिदाबाद में पदचिन्ह गांव की है। कल्याणी के बच्चे भूख से बिलखने लगते तो महेंद्र कल्याणी से गांव छोड़कर चले जाने की कहता है। चुकी बंगाल में भयानक अकाल था तो पिंडारी, डकैत हमला कर देते हैं और कल्याणी के बच्चों मार पीट कर
हो हल्ला मचा देते हैं। कल्याणी एक नदी के किनारे शरण लेती है। लेकिन पिंडारी मानते नहीं है।तब संन्यासियों की टोली निकल कर जा रही थी उसमें एक सन्यासी का नाम जीवानंद है वह कल्याणी को बचाता है।ये सब आनंद मठ के संन्यासी शिष्य थे।
इस महान उपन्यास के रचयिता श्री बंकिम चंद्र चटर्जी ने उस समय के दृश्य का वर्णन किया है। जीवानंद महेंद्र को सुजलाम सफलामा मलयाज शीतलाम सुनता है और कल्याणी की तुलना मातृ भूमि से करता है जो अपने बच्चों को किसी तरह बचाना चाहती है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1882 में यह कृति लिखी थी। तत्कालीन समय में बंगाल से आजादी के मतवालों की आवाज आने लगी थी और ब्रिटिश सरकार ने भारत को ईस्ट इंडिया कंपनी से ले कर प्रत्यक्ष शासन कायम कर लिया था। तत्कालीन वाइस राय वॉरेन हेस्टिंग ने भारत में शिक्षा, अनुसंधान, पुलिस न्यायालय, आईपीसी सीआरपीसी में अपने मुताबिक परिवर्तन कर दिए थे लॉर्ड मैकाले, लॉर्ड कार्नवालिस, अपने अनुसार नियम, कायदे कानून व्यवस्था, राजस्व,बना रहे थे। संपूर्ण भारत में प्रिंसली स्टेट को ब्रिटिश राज्य में मिलाया जा रहा था।यही वह दौर था जब इटवा के कलेक्टर ए यू हुयूम ने विश्व बिरादरी को दिखाने के लिए कांग्रेस की स्थापना की । तत्कालीन समय में कांग्रेस की कमान दादा भाई नौरोजी के हाथ में थी । तत्कालीन समय में महात्मा गांधी साउथ अफ्रीका में थे। बाल गंगा धर तिलक, विपिन चंद्र पाल, विधान चन्द्र राय कांग्रेस को समझते थे।
बंदे मातरम् सबसे पहले संगीतबद्ध किया राष्ट्र कवि रविन्द्र नाथ टैगोर ने और 1896 कांग्रेस अधिवेशन में गाया गया।
रविन्द्र नाथ टैगोर की प प्रतिशती सुमित्रा देवी ने इसे गया । लेकिन इस गीत को दिशा दी अमर शहीद खुदीराम बोस ने जब उन्हें मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दी गई तो उन्होंने कहा बंदे मातरम्।बाद में यह गीत क्रांतिकारियों का संदेश बन गया।
बंदे मातरम् पर ब्रिटिश ने प्रतिबंध लगा दिया। बंदे मातरम् बोल ने वालों को ब्रिटिश पुलिस पकड़ लेती थी और सारे आम कोड़े लगाए जाते थे।
आनंद मठ कोई साधारण उपन्यास नहीं है यह उस समय आजादी का पैगाम था ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिमी बंगाल विधानसभा चुनावों से ठीक पहले इस बंदे मातरम् को मुद्दा बनाया है यह कोई सहज घटना नहीं है।आज भी पश्चिमी बंगाल में बंदे मातरम् के प्रति लोगों का सम्मान है।
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