— दिलीप चेनॉय-
भारत का वर्चुअल डिजिटल एसेट (VDA) बाज़ार आज दो बिल्कुल अलग वास्तविकताओं में बंट चुका है। एक ओर घरेलू एक्सचेंज हैं, जो भारतीय नियामक दायरे के भीतर रहकर टैक्स, वित्तीय रिपोर्टिंग, बाज़ार आचरण और साइबर सुरक्षा से जुड़े कड़े नियमों का पालन कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, ऑफशोर एक्सचेंज इन नियमों से बाहर रहकर भारतीय उपयोगकर्ताओं को सेवाएं दे रहे हैं। और इसी नियामक असमानता ने प्रतिस्पर्धा के मैदान को असंतुलित कर दिया है, जिससे आर्थिक गतिविधियां भारत के अधिकार क्षेत्र से बाहर जा रही हैं, नियामकीय निगरानी कमजोर हो रही है और नियमों का पालन करने वाले घरेलू प्लेटफॉर्म्स का विकास बाधित हो रहा है। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि ये प्रोत्साहन उपयोगकर्ता व्यवहार, तरलता के वितरण और कर संग्रह को ऐसे ढंग से प्रभावित कर रहे हैं, जो भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के खिलाफ है।
संचालन स्तर पर यह विभाजन काफी गहरा है। घरेलू VDA एक्सचेंज एक व्यापक अनुपालन ढांचे के तहत काम कर रहे हैं, जिसमें 2023 में लागू धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2022 में जारी CERT-In के साइबर सुरक्षा निर्देश और विज्ञापन से जुड़े नियम शामिल हैं। इसके विपरीत, कई ऑफशोर प्लेटफॉर्म जो भारतीय उपयोगकर्ताओं को सेवाएं दे रहे हैं, भारत के नियामक दायरे से बाहर काम कर रहे हैं। ये न तो फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट (FIU-IND) में पंजीकृत हैं, न ही समान रूप से भारतीय KYC मानकों को लागू करते हैं, और न ही घरेलू डेटा संरक्षण व डेटा-रिटेंशन नियमों के दायरे में आते हैं। नतीजतन, ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स की अनुपालन लागत कम होती है और लेन-देन में कम रुकावट आती है, जबकि घरेलू एक्सचेंज असमान रूप से लागू नियमों के कारण कहीं अधिक नियामकीय बोझ उठाते हैं। इस असंतुलन को कर संरचना ने और अधिक गंभीर बना दिया है। वर्ष 2022 से घरेलू एक्सचेंजों पर प्रत्येक लेन-देन पर 1 प्रतिशत टीडीएस काटना अनिवार्य है। इसके विपरीत, ऑफशोर एक्सचेंज इस प्रकार की कटौती लागू नहीं करते, जिससे ट्रेडिंग गतिविधियों का बड़े पैमाने पर विदेशों की ओर पलायन हुआ है। TIOL नॉलेज फाउंडेशन के अनुसार, अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच लगभग 4.87 लाख करोड़ रुपये का ट्रेडिंग वॉल्यूम ऑफशोर एक्सचेंजों की ओर स्थानांतरित हुआ, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 4,877 करोड़ रुपये का टीडीएस संग्रह नहीं हो सका। ये निष्कर्ष Esya Centre के पूर्व अनुमानों के अनुरूप हैं, जिनमें जुलाई 2022 से अक्टूबर 2023 के बीच लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपये के वॉल्यूम के ऑफशोर शिफ्ट होने की बात कही गई थी। घरेलू प्लेटफॉर्म्स पर टीडीएस प्रत्येक ट्रेड के साथ उपयोग योग्य पूंजी को कम करता है, जिससे बाज़ार की तरलता क्षीण होती है। इसके विपरीत, इस बाधा से मुक्त ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स अधिक पूंजी-कुशल और आकर्षक वातावरण प्रदान करते हैं। स्वाभाविक रूप से, उपयोगकर्ता कम लागत और कम घर्षण वाले विकल्पों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसी दौरान, बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तक पहुंच भी एक बड़ी चुनौती बन गई है। घरेलू एक्सचेंजों को यूपीआई और औपचारिक INR भुगतान माध्यमों तक सीमित पहुंच का सामना करना पड़ रहा है, जबकि ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स पीयर-टू-पीयर एस्क्रो मैकेनिज़्म के ज़रिये विनियमित बैंकिंग चैनलों को बायपास कर लेते हैं। ये अनौपचारिक ऑन-रैम्प और ऑफ-रैम्प तेज़ फंड ट्रांसफर और बेहतर उपयोगकर्ता अनुभव प्रदान करते हैं, जबकि घरेलू प्लेटफॉर्म्स लगातार सिस्टम-स्तरीय अड़चनों से जूझते रहते हैं।
बाज़ार की संरचनात्मक चुनौतियों से परे, नियामकीय परिवेश घरेलू एक्सचेंजों के लिए गंभीर परिचालन जोखिम भी उत्पन्न करता है। व्यक्तिगत उपयोगकर्ताओं से जुड़ी जांचों के दौरान कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाई अक्सर पूरे एक्सचेंज खाते को फ्रीज़ कर देती है, जिससे असंबंधित निकासी, वेतन भुगतान और नियमित व्यावसायिक गतिविधियां भी बाधित हो जाती हैं। इसके विपरीत, भारत में भौतिक उपस्थिति के अभाव के कारण ऑफशोर प्लेटफॉर्म्स ऐसी कार्रवाइयों से काफी हद तक अप्रभावित रहते हैं। इसके व्यापक आर्थिक परिणाम भी गंभीर हैं। TIOL नॉलेज फाउंडेशन के अनुमान के अनुसार, ऑफशोर माइग्रेशन के कारण लगभग 36,257 करोड़ रुपये का आयकर संग्रह नहीं हो पाया। इसके मुकाबले, सीमित उपयोगकर्ता आधार के साथ काम कर रहे घरेलू एक्सचेंज 2024–25 के वित्तीय वर्ष में केवल लगभग 450 करोड़ रुपये ही जमा कर पाए। जिस ढांचे का उद्देश्य ट्रेसबिलिटी और निगरानी बढ़ाना था, वह व्यवहार में गतिविधियों को कम दृश्य चैनलों की ओर धकेल रहा है, जिससे राजस्व संग्रह और नियामकीय निगरानी दोनों कमजोर हो रही हैं। हालांकि भारत ने PMLA के दायरे में लाकर और आगामी क्रिप्टो एसेट रिपोर्टिंग फ्रेमवर्क (CARF) के ज़रिये निगरानी क्षमताओं को मज़बूत किया है, लेकिन मौजूदा संरचनात्मक प्रोत्साहन अभी भी गैर-अनुपालन को बढ़ावा देते हैं। इस असंतुलन को दूर करने के लिए सतही लक्षणों के बजाय मूल कारणों पर केंद्रित सुधारों की आवश्यकता है। भारतीय उपयोगकर्ताओं को सेवाएं देने वाले सभी प्लेटफॉर्म्स के लिए भारत में कानूनी और भौतिक मौजूदगी अनिवार्य की जानी चाहिए, ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। टैक्स ढांचे, विशेष रूप से मौजूदा टीडीएस संरचना, में पुनर्संतुलन ज़रूरी है ताकि तरलता का क्षरण कम हो और आर्बिट्राज के प्रोत्साहन समाप्त हों। सबसे अहम, भारतीय उपयोगकर्ताओं को सेवाएं देने वाले सभी प्लेटफॉर्म्स पर—चाहे वे कहीं भी पंजीकृत हों—एक समान नियामकीय ढांचा लागू होना चाहिए। वर्तमान इकोसिस्टम में विकृतियां घरेलू क्षमताओं की कमी के कारण नहीं, बल्कि नियामकीय दायरे के असमान लागू होने के कारण पैदा हुई हैं। यदि समय रहते संरचनात्मक सुधार नहीं किए गए, तो घरेलू एक्सचेंज निरंतर बाज़ार हिस्सेदारी खोते रहेंगे, तरलता ऑफशोर बनी रहेगी और भारत डिजिटल अर्थव्यवस्था के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में न केवल राजस्व, बल्कि अपना रणनीतिक प्रभाव भी खो सकता है।

