ऽ ड्रेस, स्वेटर व जूता-मोजा खरीदने के लिए दी गई रकम का सदुपयोग नहीं कर रहे अभिभावक
ऽ बच्चों की गरीबी और लाचारी का मखौल उड़ा रहे शिक्षक, जिम्मेदार मौन
बाराबंकी 19 दिसंबर (आरएनएस)। कड़ाके की ठंड का कहर जारी है। गलन और सर्द हवाओं से हर कोई बेहाल है। मासूम बच्चों पर भी किसी को तरस नहीं आ रहा। सर्द सुबह में उन्हें ठिठुरते-कांपते हुए स्कूल जाना पड़ रहा है। नंगे पांव स्कूल की डगर नाप रहे बच्चों को पढ़कर अपना भविष्य संवारना बेहद कष्टदायी है। जहां खिड़कियों और दरवाजों से आने वाली सर्द हवाएं उन्हें बेहाल कर रही है। वहीं शिक्षक कुर्सियों पर बैठ कर भी कांप रहे हैं, मगर बच्चों के नंगे पांव या फटे मोजे बिना जूते के पहने देख कोई पुरसाहाल लेने वाला नहीं है। परिषदीय स्कूलों में पढऩे वाले अधिकांश बच्चों के पास न तो ढंग के ऊनी कपड़े हैं और न ही जूता, चप्पल और टोपी। बावजूद अच्छी तालिम लेकर भविष्य संवारने की आस में उन्हें सुबह स्कूल आना पड़ रहा है। लाडलों की इस पीड़ा को महसूस करने के बाद भी मां-बाप बेबस बने हुए हैं। मिली जानकारी के मुताबिक बीते गुरुवार को देवा विकास खंड के प्राथमिक विद्यालय कुसुम्भा में विद्यालय की शिक्षिका ने अपनी बेटी का जन्मदिन स्कूली बच्चों के साथ मनाया। इस मौके पर प्रधानाध्यापिका शशि बाला के साथ ही राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के जिला महामंत्री संतोष वर्मा व मिशन हरियाली संयोजक पर्यावरण प्रेमी विजय प्रताप सिंह ने बच्चों को स्टेशनरी बांटते हुए फोटो खिंचवाई, लेकिन उन बच्चों के ठिठुरते नंगे पैर और फटे मोजे व बिना जूते के पांव नहीं देखे, जो उनकी लाचारी और गरीबी को दास्तां बयां कर रहे थे। यही नहीं शहर व आस-पास के स्कूलों का हाल देखा गया तो कमोवेश एक जैसी हालत हर जगह थी। कुछ जगहों पर बच्चों के पैरों में चप्पल नहीं थे तो कुछ के शरीर पर ऊनी वस्त्र भी न थे। वहीं कुछ स्कूलों की कक्षाओं में पढ़ रहे बच्चे दरवाजों और खिड़कियों से आने वाली सर्द हवाओं से कांप रहे थे। ठंड अधिक बढऩे से एक ओर जहां प्रशासन ने विद्यालय की समय सीमा को बढ़ा दिया है वहीं दूसरी ओर अधिकांश परिवार के लोग ठंड के कारण बच्चों को विद्यालय नहीं भेज रहे हैं। उनका कहना है कि ठंड को देखते हुए विद्यालय को बंद कर देना चाहिए। बहरहाल, बेसिक शिक्षा के अधीन संचालित सहायता प्राप्त प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार का जोर रहता है, ताकि समाज को शिक्षित किया जा सके। लेकिन यदि स्कूल में पढऩे आने वाले बच्चे बचपन से ही मूलभूत सुविधाएं से वंचित रहेंगे तो उनके अच्छे भविष्य की कल्पना करना थोती बाते हैं। बच्चों की समस्या पर विचार करते हुए सरकार ने उनकी मूलभूत सुविधाओं के लिए अभिभावकों के बैंक खाते में स्कूल ड्रेस, स्वेटर और जूते-मोजे खरीदने हेतु धनराशि भेजी जाती है। जिसका वह सदुपयोग न करके अपने निजी खर्च में इस्तेमाल करते है, जिसका खामियाजा नौनिहालों को उठाना पड़ता है।
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गैर जिम्मेदार बने अभिभावक
शासन द्वारा बच्चों की सुविधाओं के लिए भेजी जाने वाली धनराशि के दुरुपयोग को लेकर प्रशासन सख्त हो गया है। निर्देशों के बावजूद कुछ अभिभावक उक्त धनराशि का सदुपयोग न कर निजी खर्चों में इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे बच्चों को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। मामले को गंभीरता से लेते हुए शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि शासन की मंशा के विपरीत धनराशि का उपयोग करने वाले अभिभावकों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी। बच्चों के अधिकारों से खिलवाड़ किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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बीएसए नवीन कुमार पाठक ने बताया कि शासन के निर्देशानुसार सभी बच्चों को स्कूल ड्रेस, स्वेटर एवं जूते-मोजे उपलब्ध कराने के लिए धनराशि सीधे माता-पिता के खातों में भेजी जाती है। खण्ड शिक्षा अधिकारी से जांच कराई जाएगी। यदि जांच में यह पाया जाता है कि राशि का उपयोग बच्चों के लिए न होकर अन्य कार्यों में किया गया है, तो संबंधित के विरुद्ध नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए बच्चों की आवश्यक शैक्षिक सामग्री समय से उपलब्ध कराएं, ताकि उनका भविष्य सुरक्षित रह सके।
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