—- रामकोला विकास खण्ड में तैनात सेक्रटरी की खुली सरकारी फर्जीवाड़े की पोल।
—- सचिव ने आवेदक का फर्जी हस्ताक्षर गढ़कर निपटा दिया सूचना।
कुशीनगर, 02 जनवरी (आरएनएस)। पारदर्शिता और जवाबदेही का सबसे मज़बूत हथियार माने जाने वाला जन सूचना अधिकार अधिनियम की कुशीनगर जनपद में धज्जियाँ उडाई जा रही है। इसकी एक बानगी रामकोला खंड विकास अधिकारी कार्यालय में देखने को मिली है। जहां कागज़ी खेल और जाल साजी के ज़रिये आम जनता के अधिकार के लिए बनाये गये कानून को बेखौफ कुचला जा रहा है। बताया जाता है कि ग्राम सभा लाला छपरा की सचिव सुनीता देवी ने आरटीआई प्रकरण में अपनी जवाब देही से बचने के लिए खुद आवेदक का फर्जी हस्ताक्षर बनाकर यह दर्शा दिया कि आवेदक को सूचना उपलब्ध करा दी गयी है। जब मामले का खुलासा हुआ तो सचिव अपने गुनाह पर पर्दा डालने के लिए तरह तरह की बहाने बनाने मे जुटी है।
बताते चलें कि इस चौंकाने वाले खुलासे के बाद आवेदक ग्राम सभा लाला छपरा निवासी राकेश श्रीवास्तव ने पूरे मामले की लिखित शिकायत जिलाधिकारी से करते हुए इसे मात्र प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सोची-समझी आपराधिक साजिश बताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार की कार्य शैली जनसूचना अधिनियम 2005 की धारा 7, 18 एवं 20 का सीधा उल्लंघन है। जिसमें दोषी अधिकारियों पर जुर्माना और विभागीय कार्रवाई का प्रावधान है। इस मामले में खंड विकास अधिकारी कार्यालय रामकोला की भूमिका से यह स्पष्ट होता है कि जन सूचना अधिकारी पारदर्शिता से अधिक जवाबदेही से बचने में रुचि रखते हैं। यह रवैया न केवल कानून का अपमान है, बल्कि आम जनता के उस अधिकार पर भी सीधा हमला है। जिसके तहत वे सरकारी कार्यों की जानकारी मांग सकते हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए आवेदक ने जिलाधिकारी को दिए गए शिकायती पत्र में मांग किया है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष व समयबद्ध जांच कराई जाए और दोषी अधिकारियों पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही आवेदक ने यह भी कहा है कि यदि जिला स्तर पर न्याय नहीं मिला, तो वह उच्च न्यायालय जाने के लिए विवश होगा। आवेदक का स्पष्ट कहना है कि उसे न तो कभी वह सूचना दी गई और न ही उसने किसी रजिस्टर या दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए है। इसके बावजूद रामकोला स्थित खंड विकास अधिकारी कार्यालय के रिकॉर्ड में यह दर्ज कर दिया गया कि आवेदक स्वयं उपस्थित होकर सूचना प्राप्त कर चुका है। यह फर्जी व कूटरचित कृत्य सचिव सुनीता देवी द्वारा जान बूझकर की गई है, ताकि जन सूचना में दी गई गलत व भ्रामक सूचना की पोल खुलने से पहले ही फाइल को बंद दिखाया जा सके। मामले की गंभीरता यहीं खत्म नहीं होती। इससे पहले भी खंड विकास कार्यालय पर आरटीआई आवेदन के जवाब में आधी-अधूरी, भ्रमित करने वाली और तथ्यहीन जानकारी देने, समयसीमा का उल्लंघन करने तथा प्रथम अपील के बाद भी सुधार न करने के आरोप लग चुके हैं। अब फर्जी हस्ताक्षर का दावा सामने आने के बाद पूरे कार्यालय की कार्यप्रणाली संदेह के घेरे में आ गई है। कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह मामला केवल जनसूचना अधिनियम की धारा 20 तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जालसाजी, कूटरचना और सरकारी अभिलेखों में हेराफेरी जैसे गंभीर आपराधिक अपराधों की श्रेणी में आएगा। जिसमें दोषी कर्मचारी के विरुद्ध कठोर दंड का प्रावधान है। जिलाधिकारी को दिये गये शिकायती पत्र में आवेदक राकेश श्रीवास्तव ने मांग किया है कि प्रकरण की स्वतंत्र व निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, संबंधित सचिव सुनीता देवी की भूमिका की गहन जांच हो, तथा दोष सिद्ध होने पर न केवल विभागीय कार्रवाई बल्कि आपराधिक मुकदमा भी दर्ज किया जाए। सवाल यह है कि जब सरकारी दफ्तरों में नागरिकों के हस्ताक्षर तक सुरक्षित नहीं हैं, तो सूचना के अधिकार की सुरक्षा कौन करेगा?

