नई दिल्ली 07 Jan, (rns)- Candida auris (C. auris) एक ड्रग-रेजिस्टेंट फंगस है, जिसे पहली बार 2009 में जापान में पहचाना गया था। अब यह 60 से ज्यादा देशों में फैल चुका है। अमेरिका के 27 राज्यों में करीब 7,000 मामले सामने आ चुके हैं। CDC ने इसे ‘Urgent Antimicrobial Threat’ घोषित किया है, यानी यह ऐसा खतरा है जिसे नजरअंदाज करना जानलेवा हो सकता है। यह पहला फंगल पैथोजन है जिसे यह दर्जा मिला है।
C. auris इंसानी त्वचा और अस्पताल की सतहों पर लंबे समय तक जिंदा रह सकता है। ICU में भर्ती मरीज, वेंटिलेटर पर मरीज और कमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोग इसके सबसे आसान शिकार हैं। कई आम एंटीफंगल दवाएं इस पर असर नहीं करतीं, जिससे इलाज मुश्किल हो जाता है और संक्रमण तेजी से फैल सकता है।
वैज्ञानिकों की चेतावनी और नई उम्मीद
Hackensack Meridian Center for Discovery and Innovation की रिपोर्ट में बताया गया है कि नई पीढ़ी की एंटीफंगल दवाओं, बेहतर डायग्नोस्टिक टेस्ट और वैक्सीन-आधारित इलाज की जरूरत है। हाल की रिसर्च में यह भी पता चला कि C. auris आयरन चुराने के लिए खास जीन सक्रिय करता है। इस प्रक्रिया को रोकने से इलाज की नई राह खुल सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि कमजोर स्वास्थ्य प्रणाली वाले देशों में यह फंगस और भी गंभीर परिणाम दे सकता है। बेहतर निगरानी, सतर्कता और समय पर उपचार ही सबसे बड़ा हथियार हैं। Candida auris कोई काल्पनिक खतरा नहीं, बल्कि अस्पतालों में मौजूद खामोश कातिल है। वक्त रहते सही कदम और रिसर्च इसे काबू में ला सकते हैं, वरना यह जानलेवा संक्रमण और मरीजों की जान ले सकता है।

