नई दिल्ली 13 Jan, (Rns): सुप्रीम कोर्ट ने संसद द्वारा पारित उस विवादास्पद कानून की संवैधानिक वैधता की जांच करने पर अपनी सहमति दे दी है, जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके फैसलों के लिए आजीवन कानूनी अभियोजन (Prosecution) से छूट प्रदान की गई है। कोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए सवाल उठाया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग को ऐसी विशेष छूट दी जा सकती है, जो संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति या राज्यपाल को भी पूरी तरह प्राप्त नहीं है? इस अहम मुद्दे पर गैर-सरकारी संगठन ‘लोक प्रहरी’ की याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है।
चार हफ्ते में देना होगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट में यह अहम सुनवाई सीजेआई (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष हुई। पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस भेजकर अपना पक्ष रखने को कहा है। कोर्ट ने सभी पक्षों को जवाब दाखिल करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया है। एनजीओ लोक प्रहरी ने अपनी याचिका में दलील दी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और आयुक्तों को उनके आधिकारिक पद पर रहते हुए मिली यह कानूनी सुरक्षा और छूट अनुचित है, जिससे संतुलन बिगड़ने का खतरा है।
क्या है वह कानून जिस पर मचा है घमासान?
केंद्र की मोदी सरकार साल 2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा शर्तों से जुड़ा एक कानून लेकर आई थी, जिसे संसद के दोनों सदनों से पारित कराया गया था। इस कानून के प्रावधानों के मुताबिक, किसी भी कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों द्वारा उनकी आधिकारिक ड्यूटी के दौरान किए गए कार्यों, जैसे चुनावी निर्णय या बयानों को लेकर कोई एफआईआर (FIR) या मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता। यह सुरक्षा कवच केवल पद पर रहते हुए ही नहीं, बल्कि रिटायर होने के बाद भी पूर्व आयुक्तों पर लागू रहता है। यानी, पद छोड़ देने के बाद भी उनके कार्यकाल के दौरान लिए गए फैसलों पर कोई केस नहीं चलाया जा सकता।
एनजीओ और विपक्ष ने क्यों किया विरोध?
इस कानून का शुरू से ही विरोध हो रहा है। संसद में पारित होते समय कांग्रेस ने भी इसका पुरजोर विरोध किया था। अब सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता ‘लोक प्रहरी’ ने तर्क दिया है कि पद पर रहते हुए अगर कोई गलत काम किया गया हो, तो उस पर भी केस दर्ज न होने देना लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है। याचिका में कहा गया है कि कानून का संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है और इस तरह की ‘ब्लैंकेट इम्यूनिटी’ (पूर्ण सुरक्षा) जवाबदेही को खत्म करती है।
सरकार के जवाब पर टिकी नजरें
सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद अब यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार इस कानून के बचाव में क्या दलीलें पेश करती है। साथ ही, चुनाव आयोग अपना पक्ष कैसे रखता है, इस पर भी सबकी नजरें टिकी रहेंगी। कोर्ट अब यह तय करेगा कि कार्यपालिका द्वारा चुनाव आयुक्तों को दिया गया यह सुरक्षा कवच संविधान के दायरे में है या नहीं।

