सुप्रीम कोर्ट ने दिए डीजीपी को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का निर्देश
कोलकाता/नई दिल्ली 20 Jan, (Rns) । सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल के 1.25 करोड़ वोटर्स को अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाने के लिए एक और मौका दिया। कहा कि वे 10 दिन में अपने दस्तावेज चुनाव आयोग को पेश करें। चुनाव आयोग ने राज्य में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के दौरान नाम, सरनेम, आयु में गड़बड़ी की वजह 1.25 करोड़ वोटर्स को लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी नोटिस जारी किया था।
कोर्ट ने कहा कहा चुनाव आयोग गड़बड़ी वाली वोटर लिस्ट ग्राम पंचायत भवन, ब्लॉक कार्यालय और वार्ड कार्यालय में सार्वजनिक लगाए, ताकि लोगों को पता चल सके। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस जयमाल्या बागची की बेंच ने कहा- सिर्फ तर्क के आधार पर आम लोगों को परेशान नहीं किया जा सकता है। वोटर लिस्ट में सुधार की प्रक्रिया जरूरी है, लेकिन यह पारदर्शी और समय पर हो। चुनाव आयोग लोगों की परेशानी को समझे।
इस दौरान याचिकाकर्ता के वकील कपिल सिब्बल तो चुनाव आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने बहस की। सिब्बल ने कहा- लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के नाम पर अगर पिता और बच्चे की उम्र में 15 साल का अंतर दिखता है तो नोटिस भेज दिया जा रहा है, जबकि ड्राफ्ट रोल पहले से मौजूद है। मेरा कहना है कि पूरी लिस्ट प्रकाशित की जाए। कोर्ट निर्देश दे कि सभी बीएलओ सुधार प्रक्रिया में सहयोग करें।
सिब्बल: बंगाली नामों की स्पेलिंग, जैसे- डाटा अलग तरह से बोली जाती है, लेकिन इसे भी लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी माना जा रहा है।
द्विवेदी ने चुनाव आयोग की ओर से कहा- हम स्पेलिंग की छोटी गलतियों पर नोटिस नहीं दे रहे हैं। कई बार उम्र का अंतर गलत एंट्री के कारण होता है। नोटिस का मतलब नाम हटाना नहीं, बल्कि मतदाता को सुधार का अवसर देना है। बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) सभी राजनीतिक दलों से नियुक्त होते हैं। जस्टिस बागची ने पूछा यानी राजनीतिक दलों को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए?
द्विवेदी ने कहा- हां, घर-घर जाकर। जस्टिस बागची: फिर सुनवाई के समय क्यों नहीं?। सीजेआई: अगर कोई मतदाता अपने बीएलए के साथ आना चाहता है और वह उसकी मदद करता है, तो उसे क्यों न लिया जाए? द्विवेदी ने कह- हर सुनवाई में पार्टी का बीएलए मौजूद रहे, ऐसा संभव नहीं। यह मतदाता पर निर्भर करता है। जस्टिस बागची ने कहा- अभी केवल जिनके नाम हटाए गए हैं, उनकी सूची है। लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी वाले मतदाताओं के नाम भी लिस्ट में होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान जिन 1.25 करोड़ लोगों के खिलाफ तार्किक विसंगति की आपत्ति उठी है, उनके नाम प्रकाशित किए जाएं। ये नाम पंचायत और वार्ड कार्यालयों में प्रकाशित होने चाहिए हैं। शीर्ष अदालत ने गौर किया कि दस्तावेजों के सत्यापन के लिए करीब दो करोड़ लोगों को नोटिस जारी किए गए। इन नोटिसों को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है पहला मैप किए गए, मैप नहीं किए गए और तार्किक विसंगति शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तार्किक विसंगति श्रेणी के अंतर्गत, अधिकारियों द्वारा पिता के नाम का मिलान न होना, माता-पिता की आयु का मिलान न होना और दादा-दादी की आयु में अंतर मिला है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, इस पूरी प्रक्रिया में लोगों को दूर-दूर न जाना पड़े, लंबी यात्रा न करनी पड़े, इसलिए दस्तावेज जमा करने का केंद्र पंचायत भवन या ब्लॉक ऑफिस में ही होगा। अगर अधिकारी दस्तावेज से संतुष्ट नहीं होते, तो व्यक्ति को सुनवाई का मौका दिया जाएगा, जिसमें उसका प्रतिनिधि भी शामिल हो सकता है। इतना ही नहीं अधिकारी जब दस्तावेज लेंगे या सुनवाई करेंगे, तो उसकी रसीद भी देंगे। इतना ही नहीं राज्य सरकार को चुनाव आयोग को पर्याप्त स्टाफ भी उपलब्ध कराना होगा।
शीर्ष अदालत ने पश्चिम बंगाल के डीजीपी को कानून-व्यवस्था बनाए रखने का निर्देश भी दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि आम लोगों पर कितना दबाव और तनाव है। एक करोड़ से ज्यादा लोगों को नोटिस भेज दिए गए हैं। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि गांगुली, दत्ता जैसे नाम अलग-अलग तरीके से लिखे जाते हैं, इसी वजह से लोगों को नोटिस भेज दिए गए। उन्होंने यह भी कहा कि कई मामलों में माता-पिता और बच्चे की उम्र में 15 साल से कम का अंतर होने पर भी नोटिस भेजा गया है। इस पर जस्टिस जयमाल्य बागची ने कहा कि 15 साल का उम्र का अंतर कैसे तार्किक गड़बड़ी हो सकता है? हमारे देश में छोटी उम्र में शादी हो जाती है।
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