नईदिल्ली,21 जनवरी (आरएनएस)। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को पिछले 12 महीनों में असफल हुए मिशनों के कारण नष्ट हुए 3 राष्ट्रीय सुरक्षा उपग्रहों को प्रतिस्थापित करने में 2-3 वर्ष का समय लगेगा। इसके पीछे वजह रॉकेट और उपग्रहों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की आपूर्ति में लगने वाला समय है। पिछले 6 प्रक्षेपणों में से 3 विफल हुए, जिनमें जीएसएलवी-एफ15, पीएसएलवी-सी62 और पीएसएलवी-सी62 मिशन शामिल हैं। नष्ट हुए तीनों सरकारी वित्त पोषित उपग्रह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
इसरो के अनुसार, रॉकेट्स और उपग्रहों में उपयोग होने वाली कुछ महत्वपूर्ण सामग्रियां और अंतरिक्ष-स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आयात किए जा रहे हैं। रॉकेट के लिए आयात का हिस्सा लगभग 10 और उपग्रह के लिए लगभग 50-55 फीसदी है। इसमें मेमोरी चिप्स, सेंसर, ऑनबोर्ड कंप्यूटर, रिले और अन्य वस्तुएं शामिल हैं। इनमें से कुछ पुर्जे अंतरराष्ट्रीय विक्रेताओं से आसानी से उपलब्ध हैं, जबकि कुछ विशेष रूप से बनवाए जाते हैं और उनकी डिलीवरी में समय लगता है।
सभी पुर्जों के उपलब्ध होने पर भी एक पूरे उपग्रह को असेंबल करने, एकीकृत करने और परीक्षण करने में कई महीने और साल भी लग जाते हैं। इसरो अपने अधिकांश उपग्रहों का निर्माण और संयोजन अपने ही प्लांट्स में करता है। इसलिए, भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी को असफल मिशनों को फिर से पूरा करने के लिए अपने मानव संसाधनों का पुनर्वितरण करना होगा, साथ ही विभिन्न चरणों में चल रहे मिशनों को प्राथमिकता देनी होगी।
अगस्त, 2021 में जीएसएलवी रॉकेट के क्रायोजेनिक चरण में खराबी के कारण इसरो पृथ्वी की छवि लेने वाले भूस्थिर उपग्रह जीसैट-1 को लॉन्च करने में विफल हो गया। जनवरी, 2026 तक इसके प्रतिस्थापन उपग्रह को कक्षा में स्थापित नहीं किया जा सका है। पिछले साल जनवरी में थ्रस्टर वाल्व के न खुलने के कारण एनवीएस-02 नेविगेशन उपग्रह अपनी गंतव्य कक्षा में नहीं जा सका। अंतरिक्ष एजेंसी अब तक विफल हुए एनवीएस-02 को प्रतिस्थापित नहीं कर पाई है।
००
Login
अपनी भाषा में समाचार चुनने की स्वतंत्रता | देश की श्रेष्ठतम समाचार एजेंसी

