कोलकाता 22 जनवरी (आरएनएस)। जहां चुनाव आयोग ने मुख्य बंगाल के सचिव, डीजी और मेयर को कड़ा पत्र भेजा, कानून-व्यवस्था तोडऩे पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी। वहीं बताया गया है कि, कथित ‘लॉजिकल गड़बडिय़ोंÓ की सूची शनिवार को को जारी की जाएगी। उक्त मुद्दे पर चुनाव आयोग ने सीधे राज्य के टॉप एडमिनिस्ट्रेटिव और पुलिस अधिकारियों को लिखा है कि वे यह पक्का करें कि पश्चिम बंगाल में कोई अशांति, गड़बड़ी या प्रशासनिक लापरवाही न हो, सुनवाई या सुधार प्रक्रिया पर ध्यान रखना होगा। राज्य के मुख्य सचिव, राज्य पुलिस के डीजी और कोलकाता के नगर निगम के कमिश्नर को भेजे गए लेटर में उन्हें कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सख्त रवैया अपनाने का निर्देश दिया गया है।
मुख्य चुनाव आयोग कमिश्नर ज्ञानेश कुमार ने काम में लापरवाही नहीं करने की जहां चेतावनी दी है। वहीं ज्ञानेश कुमार ने आज बंगाल के नागरिकों को साफ भरोसा भी दिया है। उन्होंने एक चेतावनी के तहत कहा- पश्चिम बंगाल के सभी नागरिकों की सुरक्षा पक्की की जाएगी। प्रशासन इस पर कड़ी नजर रखेगा ताकि कोई भी कानून अपने हाथ में न ले सके। उन्होंने यह भी कहा कि अगर ऐसी कोई घटना होती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त और कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
चुनाव आयोग के पत्र में साफ़ तौर पर कहा गया है कि एसआईआर फेज के दौरान हर जगह कानून व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर को याद दिलाते हुए। आयोग ने चेतावनी दी है कि अगर इस ऑर्डर को नहीं माना गया या अधिकारियों की किसी भी कार्रवाई या लापरवाही से वोटर लिस्ट रिवीजन प्रोसेस में रुकावट आई, तो संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त एक्शन लिया जाएगा।
इस बीच, इलेक्शन कमीशन ने पश्चिम बंगाल में मौजूदा ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीÓ और ‘अनमैप्डÓ वोटर्स को लेकर एक नोटिफिकेशन भी जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर का पालन करते हुए, 24 जनवरी, 2026 तक इन दोनों कैटेगरी के वोटर्स के नाम पब्लिक में दिखाने का फैसला किया गया है। चुनाव आयोग की तरफ से राज्य के चीफ इलेक्शन ऑफिसर को भेजे गए दिश निर्देश में बताया गया है कि यह लिस्ट ग्राम पंचायत बिल्डिंग, ब्लॉक ऑफिस, तालुक लेवल ऑफिस और शहरों के वार्ड ऑफिस समेत सभी ज़रूरी पब्लिक जगहों पर दिखाई जानी चाहिए। मकसद एक है – ताकि वोटर्स आसानी से जान सकें कि उनका नाम किसी प्रॉब्लम वाली लिस्ट में है या नहीं। लेटर में आगे कहा गया है कि जिनके नाम ‘लॉजिकल डिसकंसिस्टेंसीÓ या ‘अनमैप्डÓ के तौर पर मार्क किए गए हैं, वे खुद या किसी अधिकृत प्रतिनिधि के ज़रिए दस्तावेज और अपत्ति जमा कर सकते हैं। अगर प्रतिनिधि चाहे तो वह बूथ लेवल एजेंट भी हो सकता है। ऐसे में, वोटर के साइन या अंगूठे के निशान के साथ परमिशन लेटर ज़रूरी है। इंस्ट्रक्शन्स के मुताबिक, हर पोलिंग स्टेशन एरिया के पास एक पंचायत भवन, ब्लॉक ऑफिस या वार्ड ऑफिस तय किया जाना चाहिए, जहाँ डॉक्यूमेंट्स जमा किए जाएँगे और उन पर सुनवाई होगी। लिस्ट पब्लिश होने के बाद क्लेम या ऑब्जेक्शन उठाने के लिए एक्स्ट्रा 10 दिन दिए जाएंगे। सबसे ज़रूरी बात यह है कि सिफऱ् डॉक्यूमेंट्स जमा करना ही नहीं, बल्कि हर मामले में ईआरओ या एईआरओ के जरिए सुनवाई भी ज़रूरी है। वह सुनवाई सीधे या किसी ऑथराइज़्ड रिप्रेजेंटेटिव के जरिए की जा सकती है। डॉक्यूमेंट्स मिलने और सुनवाई का सर्टिफिकेट संबंधित ऑफिसर को दिया जाना चाहिए, जिसे बाद में बीएलओ ऐप पर अपलोड किया जाएगा। कमीशन के इंस्ट्रक्शन्स में यह भी साफ किया गया है कि अगर जन्मतिथि लिखी हो तो माध्यमिक (क्लास 10) का एडमिट कार्ड भी डॉक्यूमेंट के तौर पर एक्सेप्टेबल है। कुल मिलाकर, पॉलिटिकल और एडमिनिस्ट्रेटिव हलकों का मानना है कि इलेक्शन कमीशन का यह सख्त रुख वोटर लिस्ट रिवीजन प्रोसेस में ट्रांसपेरेंसी, लीगल प्रोटेक्शन और शांतिपूर्ण माहौल बनाए रखने के लिए है। यह देखना बाकी है कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बंगाल में ‘लॉजिकल डिसकम्पेसीÓ का मुद्दा किस तरफ बढ़ेगा।
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