मुंबई 28 Jan, (Rns): राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के दिग्गज नेता और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है। एक भयानक विमान हादसे में उनका आकस्मिक निधन हो गया। यह हादसा उस वक्त हुआ जब वे अपने निजी विमान से बारामती जा रहे थे। रास्ते में तकनीकी खराबी आने के कारण विमान क्रैश लैंडिंग का शिकार हो गया और देखते ही देखते उसमें आग लग गई। इस दर्दनाक दुर्घटना में अजित पवार के साथ-साथ विमान में सवार अन्य लोगों की भी जान चली गई। इस खबर से पूरे महाराष्ट्र और देश के राजनीतिक गलियारों में शोक की लहर है।
परिवार का साथ छूटा, पत्नी और बेटों पर टूटा दुखों का पहाड़
अजित पवार अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनके परिवार में उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार और दो बेटे पार्थ व जय पवार हैं। अजित पवार का अपने परिवार से गहरा लगाव था और अक्सर सार्वजनिक कार्यक्रमों में उन्हें परिवार के साथ देखा जाता था। उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार चुनावी रैलियों और रोड शो में उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलती थीं। उनके बड़े बेटे पार्थ पवार राजनीति में सक्रिय हैं, जबकि छोटे बेटे जय पवार को पिता का करीबी सहयोगी माना जाता था। जय की शादी प्रसिद्ध व्यवसायी की बेटी रुतुजा पाटिल से हुई है। अजित पवार हमेशा अपने निजी जीवन को चकाचौंध से दूर रखते थे, लेकिन परिवार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जगजाहिर थी।
चाचा शरद पवार की उंगली पकड़कर सीखा राजनीति का ककहरा
अजित पवार का संबंध राज्य के सबसे प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवारों में से एक से था। उनके बड़े भाई श्रीनिवास पवार एक सफल व्यवसायी हैं, जिनसे उनका रिश्ता बेहद मजबूत था। उनकी बहन विजया पाटिल भी सामाजिक कार्यों में सक्रिय रही हैं। अजित पवार के राजनीतिक गुरु उनके चाचा और एनसीपी संस्थापक शरद पवार थे। शरद पवार के मार्गदर्शन और अनुभव ने ही अजित पवार को एक कुशल राजनेता बनाया। उनकी चचेरी बहन सुप्रिया सुले के साथ भी उनके पारिवारिक संबंध घनिष्ठ रहे।
स्टूडियो से सहकारिता और फिर मंत्रालय तक का सफर
अजित पवार का जीवन संघर्ष और मेहनत की मिसाल रहा। उनका जन्म 22 जुलाई 1959 को अहमदनगर जिले के देओलाली प्रवरा गांव में हुआ था। उनके पिता अनंतराव पवार मुंबई के मशहूर राजकमल स्टूडियो में काम करते थे। पिता के आकस्मिक निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी अजित पवार के कंधों पर आ गई, जिसके चलते उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। उन्होंने 1982 में एक सहकारी चीनी कारखाने के बोर्ड सदस्य के रूप में राजनीति में पहला कदम रखा। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपनी संयमित, व्यावहारिक और रणनीतिक कार्यशैली के दम पर उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी एक अलग और मजबूत पहचान बनाई। उनका जाना भारतीय राजनीति के लिए एक अपूरणीय क्षति है।

