सालाना बजट आज महज वित्तीय विवरण, कर दरों में हेरफेर, खर्च के लक्ष्यों की घोषणा और जहां-तहां कुछ प्रोत्साहनों के एलान का दस्तावेज भर रह गया है। बुनियादी आर्थिक समस्याओं के हल की बात उसके दायरे से बाहर हो चुकी है।
कांग्रेस की राय में केंद्रीय बजट अर्थव्यवस्था की बुनियादी चुनौतियों से आंख मिलाने में नाकाम रहा। दरअसल, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने तो यहां तक कहा कि वित्त मंत्री ने उन चुनौतियों को सिरे से नजरअंदाज कर दिया। मसलन, अमेरिकी टैरिफ से कारखाना उत्पादकों और निर्यातकों के सामने आई चुनौतियों, व्यापार घाटे, निम्न ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन, एफडीआई की अनिश्चितता, राजकोषीय सेहत में सुधार की धीमी गति, महंगाई के सरकारी आंकड़ों एवं अनुभवजन्य स्थिति में फर्क, लाखों एमएसएमई इकाइयों के बंद होने, बेरोजगारी, और शहरी बुनियादी ढांचे में लगातार गिरावट पर निर्मला सीतारमन ने चुप्पी साध ली। ये आलोचना वाजिब है। यह हकीकत है कि आज सालाना बजट महज वित्तीय विवरण, कर दरों में हेरफेर, खर्च के लक्ष्यों की घोषणा और जहां-तहां कुछ प्रोत्साहनों के एलान का दस्तावेज भर रह गया है।
मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था जब असल में मोनोपॉली पूंजीवाद का रूप ले चुकी हो, तो बिना उस ढांचे को चुनौती दिए सरकारें अक्सर ढांचागत समस्याओं का हल निकालने में अक्षम हो जाती हैं। नतीजतन, बजट के जरिए शायद ही बाजार में मांग और निजी निवेश की स्थितियां बनाई जा सकती हैं। बिना ऐसा हुए ना तो रोजगार सृजन संभव है, और ना ही मानव विकास या रहन-सहन की बेहतर सूरत बनाना। देसी बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं नहीं होगी, तो भारतीय उत्पादों का अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में टिकने की बात महज एक खामख्याली ही है। बाकी जहां तक व्यापार घाटा, पर्याप्त मात्रा में एफडीआई ना आना या पोर्टफोलियो इन्वेस्टरों के भारत से पैसा निकालने, या रुपये की कीमत मे गिरावट की बात है, तो वे जारी हालात के नतीजे हैं। यथार्थ तो यह है कि लगातार अपनी ताकत कॉरपोरेट सेक्टर को ट्रांसफर करती गई सरकार की अब ऐसे मसलों का हल ढूंढने की काबिलियत अब काफी हद तक क्षीण हो चुकी है। इस हाल में आबादी के कुछ समूहों को नकदी हस्तांतरण कर चुनावी लाभ की योजनाएं शुरू करने से आगे कुछ करने को वह सोच नहीं पाती। उन योजनाओं के जरिए जन समस्याओं का हल करने की सांत्वना का भ्रम वह पैदा करती है। इस बार भी वह इतना ही कर पाई।


















