हरिद्वार,07 मार्च (आरएनएस)। हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर यात्रियों को ट्रेन में सीट दिलाने का झांसा देकर ठगी करने वाले गिरोह के दो और सदस्यों को रेलवे पुलिस ने बिहार के सीतामढ़ी जिले से गिरफ्तार किया है। दोनों को ट्रांजिट रिमांड पर लाकर हरिद्वार कोर्ट में पेश किया गया। जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। इस गिरोह के अब तक चार सदस्य गिरफ्तार किए जा चुके हैं। पकड़े गए आरोपियों से ठगी के शिकार युवक का मोबाइल फोन और सिम कार्ड भी बरामद किया गया है। शनिवार को एसपी जीआरपी अरुणा भारती ने बताया कि बीते कुछ समय से रेलवे स्टेशन पर बाहरी राज्यों से आने वाले मजदूरों और यात्रियों के साथ ठगी की घटनाएं सामने आ रही थीं। अयोध्या के मंझनपुर निवासी मनोज कुमार तिवारी ने गत 24 जनवरी को जीआरपी थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने बताया था कि 31 दिसंबर 2025 को वह हरिद्वार से घर लौट रहे थे। ट्रेन में आरक्षण नहीं होने पर एक युवक ने खुद को टीटी का रिश्तेदार बताते हुए सीट कंफर्म कराने का भरोसा दिलाया। उनसे मोबाइल फोन, आधार कार्ड और पिन ले लिया। इसके बाद उनके खाते से यूपीआई के माध्यम से 60,500 रुपये निकाल लिए गए।जीआरपी थाना प्रभारी निरीक्षक बिपिन चंद्र पाठक ने बताया कि मुकदमा दर्ज करने के बाद बैंक खातों और मोबाइल नंबरों की जांच की गई। जांच में एक मोबाइल नंबर झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के प्रह्लाद सिंह के नाम पर मिला। पुलिस टीम ने उससे पूछताछ की तो पता चला कि उसका मोबाइल और दस्तावेज पहले ही चोरी हो चुके थे। उनका इस्तेमाल ठग गिरोह कर रहा था। इसके बाद जीआरपी और एसओजी टीम को तकनीकी साक्ष्यों और कॉल डिटेल रिकॉर्ड के आधार पर आरोपी राजेश कुमार और विपिन कुमार की लोकेशन बिहार के सीतामढ़ी जिले में बेला थाना क्षेत्र के सिरसिया बाजार में मिली। मिली। पुलिस टीम ने वहां दबिश देकर आरोपी राजेश कुमार और विपिन कुमार गिरफ्तार कर लिया। उनसे पूछताछ में पता चला कि गिरोह में रामकिशोर यादव नाम का व्यक्ति भी शामिल था। उसे कुछ दिन पहले ही गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है।थाना प्रभारी निरीक्षक बिपिन चंद्र पाठक के अनुसार गिरोह के सदस्य अपनी पहचान छिपाने के लिए अलग-अलग मोबाइल और सिम कार्ड का इस्तेमाल करते थे। वारदात के दौरान चोरी के मोबाइल और सिम से ऑनलाइन लेनदेन किया जाता था। कुछ समय बाद उन्हें नष्ट कर दिया जाता था। गिरोह खास तौर पर बिहार, झारखंड और पूर्वांचल के मजदूरों को निशाना बनाता था। अपनी स्थानीय बोली में बातचीत कर वे पीडि़तों का विश्वास जीत लेते थे। पांच से सात दिन के भीतर अपना ठिकाना बदल देते थे। इस कारण पीडि़त और पुलिस को उन तक पहुंचना मुश्किल हो जाता था।

