अजय दीक्षित
विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता के देश अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने जैसे पूरी दुनिया, विशेषकर मध्य पूर्व एशिया को युद्ध की आग में झोंककर तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। इसराइल ने 28 फरवरी को अमेरिका के साथ मिलकर ईरान में मिसाइलों, बम वर्षक विमानों से एक साथ हमला कर ईरान के सुप्रीम कमांडर अली खुमेनई सहित, रक्षा मंत्री, गृह मंत्री,43 लोगों को मौत के घाट उतार दिया है। विगत तीन दिन से इसराइल और ईरान में घमासान मचा हुआ है। दूसरी ओर ईरान ने दुबई, कुवैत, यमन, दोहा, जद्दा, बहरीन, आबुधाबी में स्थित अमेरिका के ठिकानों पर हमला कर दिया।
दुनियां भर में इसराइल और अमेरिका के इस कृत्य की निंदा हो रही है। यहां तक कि पाकिस्तान और भारत में भी कई शहरों लोगों ने विरोध जताया है। हालांकि भारत आधिकारिक तौर पर विश्व शांति की अपील की है।
इस घटनाक्रम का विश्व बाजार पर गहरा असर पड़ेगा। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेगी क्योंकि पूरे विश्व का 22 फीसदी क्रूड ऑयल भंडार ईरान पर है और भारत अपनी जरूरत का तीस फीसदी तेल ईरान से खरीदता है।ईरान ने मिसाइलों से दुबई, कुवैत, यमन, दोहा, जद्दा, बहरीन आबुधाबी,के तेल संयंत्रों को बर्बाद कर दिया है। आज बाजार खुलते ही सेंसेक्स 1000 पॉइंट नीचे गिर गया।
दरअसल जब से 2025 से दूसरी बार यू एस प्रेसिडेंट बने हैं डोनाल्ड ट्रंप तब उनके फैसलों में आग निकल रही है। पहले उन्होंने टैरिफ बार खेला और भारत , चाइना को इस जाल में फंसा कर अपनी बात मनवाई।इस वर्ष उन्होंने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति मादुरो को पकड़कर अमेरिकी जेल में डाल दिया और वेनेज़ुएला पर कब्जा कर लिया।
ईरान पर आठ माह पूर्व उसके परमाणु हथियारों के ठिकानों पर हमला किया। बस रूस ही ऐसा देश है जो अमेरिकी दबाब में नहीं आ रहा है और वह भी यूक्रेन को हड़प रहा है।
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस।
इतना नहीं नाटो देश भी अब अमेरिका के साथ है। जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड ने अपनी सेना युद्ध में उतारने का मन बना लिया है।
डॉनल्ड ट्रंप से पहले के यू एस प्रेसिडेंट चाहे वह बराक ओबामा रहे हो या जोए बाइडन, यहां तक कि जॉर्ज बुश,सीनियर,जूनियर, विश्व राजनीतिक दखल तो रखते हुए सौम्यता बनाए रखते थे।हालांकि 50 वर्षों में मध्य पूर्व एशिया में अमेरिका ने सऊदी अरब, कुवैत, यमन, दोहा जद्दा, बहरीन, आबुधाबी को अपने रखा कवच में रखा है और वहां पर अमेरिका के सैनिक अड्डे, हवाई जहाज है।
लेकिन इसराइल को उन्होंने विशेष रूप से सृजित किया है। इसराइल के पास आज ईरान,इराक,जैसे बड़े से अधिक सैन्य क्षमता है। यह सब अमेरिका का किया धारा है।ईरान भी कट्टर मुस्लिम शिया देश है जबकि साउथ एशिया में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, यूएई, सऊदी अरब, कुवैत यमन दोहा जद्दा बहरीन आबुधाबी,सभी सुन्नी मुस्लिम देश है।ईरान को केवल लेबनान, बेरुत से सहयोग मिलता है।इसी लिए उसने हिज्बुल्लाह,हमास, अलकायदा, तालिबान, मिलेशिया को पनपा रखा है। ईरान का इतिहास भी कम रक्त रंजित नहीं है।यहां भी 1979 से पहले राजा पहलवी की किंग डम थी लेकिन अयातुल्ला खोमानी नामक कट्टर पंथी ने इस्लामिक क्रांति कर दी और ईरान का खुला पन जाता रहा है महिलाओं पर बेहद कड़े कानून लागू हुए ।1989 में अयातुल्ला खोमानी की निधन के बाद से 37 वर्ष से अली खुमेनई का शासन है। ईरान इसराइल से निपटने के लिए परमाणु हथियारों को हासिल करना चाहता था उसने 90 फीसदी तक यूरेनियम का परिशोधन कर लिया था।
लेकिन अमेरिका ने अगस्त 2025 में उनका परमाणु हथियार बनाने वाला स्थान पर बमबारी की । दरअसल सऊदी अरब कुवैत यमन दोहा जद्दा बहरीन आबुधाबी, सभी चाहते हैं कि ईरान मध्य पूर्व में मुस्लिम देशों का नेता बनना चाहता है।
ईरान के पूरे विश्व का 22 फीसदी क्रूड ऑयल भंडार है जो वेनेज़ुएला के बाद दूसरे स्थान पर है।
डॉनल्ड ट्रंप ने ईरान को दबाने की मोहिम तो अपने पहले कार्यकाल से चला रखी है लेकिन 2021 के चुनाव में वे जोए बाइडन से हार गए थे। लेकिन इस बार उन्होंने इसराइल से मिल कर ईरान पर कब्जा तो नहीं अपना उल्लू बैठाने का फैसला कर दिया था। और अमेरिका में रह रहे पहलवी बांसाज़ को सत्ता सौंपेगे।इसी लिए अमेरिका ने सबसे पहले अली खुमेनई को निपटाया है। सूत्र बताते हैं कि यह युद्ध अभी रुकने वाला नहीं है।लगे हाथ इजरायल ने भी गाजा पट्टी पलस्तीन खाली कराली है। पलस्तीनियों को अफ्रीकी देश में बसाने की मुहिम चल रही है।अन्य मुस्लिम देश पाकिस्तान अफगानिस्तान में उलझ गया है।
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