हरिशंकर व्यास
दुनिया भर में एक के बाद एक बड़े सम्मेलन हो रहे हैं। पहले जनवरी में स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच की बैठक हुई। उसके बाद फरवरी में जर्मनी में म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस हुई। फिर दिल्ली में एआई इम्पैक्ट समिट हुआ। अगले महीने भारत में रायसीना डायलॉग्स होंगे। सवाल है कि इन तमाम सम्मेलनों में भारत के लिए क्या है? क्या दुनिया भारत को पूछ रही है या भारत किसी भी मामले में दुनिया को रास्ता दिखा रहा है? आर्थिक मंच की बैठक में या सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में या एआई समिट में भारत के पास दिखाने के लिए क्या था? ले देकर भारत के पास एकमात्र चीज यह है कि भारत दुनिया भर के उत्पाद खरीद सकता है। चाहे उपभोक्ता उत्पाद हों या हथियार हों या एआई की तकनीक हो, भारत एक खरीदार है। इसके अलावा कोई भारत की परवाह नहीं करता।
म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में भी दुनिया की प्राथमिकता दिखी। जिस समय यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की का सेशन होना था उस समय पूरा हॉल भरा हुआ था, लोग खड़े होकर फ्रांस और यूक्रेन की बात सुन रहे थे। यूरोप के लोगों के लिए रूस और यूक्रेन का युद्ध एक चिंता की बात है। लेकिन इसके तुरंत बाद भारत और जर्मनी का सेशन था, जिसमें पूरा हॉल खाली पड़ा हुआ था। किसी को इस बात की चिंता नहीं थी कि भारत क्या कह रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि रूस और यूक्रेन युद्ध में भारत ने किसी तरह की भूमिका नहीं निभाई। भारत ने सिर्फ बयानबाजी की। प्रधानमंत्री मोदी ने हर जगह कहा कि यह युद्ध का समय नहीं है। उनको लगता था कि यह बहुत बड़ा वाक्य है और इसे बोलने से युद्ध खत्म हो जाएगा। लेकिन युद्ध के चार साल हो गए। यूरोप के सारे देश यूक्रेन की मदद करते रहे लेकिन भारत इस दौरान रूस से तेल खरीदता रहा। तभी म्यूनिक सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में भारत अप्रासंगिक था। भारत के विदेश मंत्री एस जय़शंकर अपनी बात कह आए लेकिन किसी ने उस पर ध्यान नहीं दिया।
उससे पहले दावोस में भारत के कई राज्यों के मुख्यमंत्री और कई केंद्रीय मंत्री विश्व आर्थिक मंच में हिस्सा लेने पहुंचे थे। लेकिन पूरा सम्मेलन अमेरिका और यूरोप के मुद्दे पर केंद्रित रहा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई मंत्रियों के साथ पहुंचे थे और अमेरिका ने अपना पैवेलियन बनवाया था। लेकिन दावोस में यूरोप के देशों ने कमाल की एकजुटता दिखाई। ट्रंप ने ग्रीनलैंड लेने की बता कही तो अगली कतार में बैठे ऑस्ट्रिया के राष्ट्रपति उठ कर चले गए। उनके साथ साथ यूरोप के ज्यादातर देशों के नेता वहां से निकल गए।
सबने बाहर जाकर कहा कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। यूरोप के देशों ने मिल कर ट्रंप की दादागिरी का मुकाबला किया और मजबूरी में ट्रंप को टैरिफ लगाने के फैसले से पीछे हटना पड़ा। लेकिन वहां भी भारत के नेता क्या कर रहे थे? महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस ने दावोस जाकर अपने ही राज्य के एक बड़े बिल्डर लोढा समूह के साथ एग्रीमेंट किया। इसी तरह झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दावोस में टाटा समूह के साथ करार किया। सोचें, भारत के मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री दावोस जाकर ऐसे ही घूमते रहे और अपनी देशी कंपनियों से ही निवेश का करार करके लौटे।
ऐसे ही दिल्ली के एआई समिट में हुआ है। दुनिया भर की एआई कंपनियों ने भारत में अपने लिए बाजार की संभावना देखी और निवेश का वादा किया। यह कितनी हैरानी की बात है कि भारत ने ओपन एआई के सैम ऑल्टमैन, एंथ्रोपिक्स के डारियो अमोदाई, गूगल के सुंदर पिचाई आदि की बात की लेकिन किसी दूसरे देश ने भारत के सर्वम या परम की बात नहीं की। इसका मतलब है कि भारत में एआई के सेक्टर में जो काम हो रहा है उसे लेकर दुनिया में कोई गंभीर नहीं है।
सबको पता है कि भारत में कोई ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार नहीं हो रहा है, जो चैटजीपीटी या ग्रॉक या क्लॉड, जेमिनी या परप्लेक्सिटी या डीपसीक का मुकाबला कर सके। भारत सेक्टर बेस्ड एप्लीकेशंस बनाएगा, जिसे भारत में भी कम ही लोग इस्तेमाल करेंगे। भारत की तकनीकी क्षमता की पहले परीक्षा हो चुकी है। दुनिया देख चुकी है कि भारत एक ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं बना पाया और न सोशल मीडिया का एक प्लेटफ़ॉर्म बना सका। सो भारत लार्ज लैंग्वेज मॉडल कैसा बनाएगा यह दुनिया को पता है। भारत में सिर्फ टेलर मेड एप्लीकेशन तैयार होंगे। भारत का कोई भी एआई उत्पाद दुनिया में जगह नहीं बना पाएगा।
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