सौरभ वार्ष्णेय
इसे भारत की सफल कूटनीति की जीत तो कहा ही जायेगा इसके साथ-साथ भारत ने अपनी अदम्य सहास का परिचय भी दे दिया है। यानी देशवासी अब चिंता न करें । एलपीजी की समस्या जल्द सामान्य हो जायेगी। क्योंकि जैसे युद्व के बीच दो जहाज का भारत एलपीजी लेकर आना भारत की सफलता मानी जायेगी। भारत शुरु से ही शांतिप्रिय देश है और हमेश से शांति में ही रहने से अपील करता आया है। ऐसे में मिडिल ईस्ट में जारी जंग के बाद एलपीजी गैस की सप्लाई प्रभावित हुई इसमें कहने से गुरेज नहीं करना चाहिए क्योंकिे एलपीजी का अधिक समय तक स्टोरेज नहीं कर सकते? ऐसे समय में जब भारत देश में गैस एजेंसी के बाहर लम्बी लम्बी लाइनें लग रही है जो कि अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से भारत में एलपीजी की आपूर्ति होना शुरू होने के बाद इस समस्या के अंत के अच्छे संकेत हैं। यह जीत किसी एक व्यक्ति की नहीं अपितु यह हमारे भारत देश की सफल राजनीति, कूटनीतिज्ञ, दूरदर्शिता की महाजीत है।
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े युद्ध जैसे हालात के बीच भारत ने जिस तरह अपनी ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखते हुए एलपीजी की आपूर्ति सुनिश्चित की है, वह उसकी परिपक्व और संतुलित कूटनीति का स्पष्ट उदाहरण है। वैश्विक संकट के दौर में ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की आर्थिक स्थिरता की रीढ़ होती है, और भारत ने इस चुनौती को अवसर में बदलने का काम किया है। भारत लंबे समय से ऊर्जा आयात पर निर्भर रहा है, विशेषकर पश्चिम एशिया के देशों पर। ऐसे में जब ईरान के आसपास भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा और सप्लाई चेन बाधित होने की आशंका बनी, तब भारत के सामने दोहरी चुनौती थी—एक ओर ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना और दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच संतुलन बनाए रखना। भारत की कूटनीतिक रणनीति यहां बहु-आयामी रही। एक तरफ उसने अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखा, वहीं दूसरी ओर ईरान जैसे महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार के साथ संवाद के दरवाजे खुले रखे। परिणामस्वरूप, भारत न केवल वैकल्पिक स्रोतों से रुक्कत्र की आपूर्ति सुनिश्चित करने में सफल रहा, बल्कि आवश्यक मात्रा में ईंधन की उपलब्धता भी बनाए रखी। इस पूरी प्रक्रिया में भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता की नीति को मजबूती से अपनाया। भारत ने किसी एक धड़े में पूरी तरह झुकने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी। यही कारण है कि संकट के बावजूद घरेलू बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ा और कीमतों में भी अपेक्षाकृत स्थिरता बनी रही।
इसके अलावा, भारत ने सऊदी अरब, यूएई और अन्य ऊर्जा उत्पादक देशों के साथ अपने रिश्तों को और मजबूत किया, जिससे सप्लाई के वैकल्पिक रास्ते खुले। यह कदम दर्शाता है कि भारत केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं, बल्कि दूरदर्शी कूटनीति पर काम कर रहा है।
हालांकि, यह भी सच है कि ऐसे संकट भारत के लिए चेतावनी भी हैं। ऊर्जा के लिए बाहरी निर्भरता को कम करने, नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाने और घरेलू उत्पादन को मजबूत करने की जरूरत पहले से अधिक महसूस की जा रही है।
ईरान युद्ध के बीच कच्चे तेल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत की संतुलित, व्यावहारिक और प्रभावी कूटनीति की बड़ी जीत है। यह संदेश भी देता है कि बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच भारत अपने हितों की रक्षा करना अच्छी तरह जानता है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है, समाचार पत्र व पत्रिकाओं में समसमायिक विषयों पर चिंतक, राजनीतिक विचारक है।
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