सत्येन्द्र रंजन
डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन की विदेश एवं युद्ध नीतियों का क्या मकसद है, अपने इस भाषण में मार्को रुबियो ने इसे दो-टूक या बेहिचक लहजे में दुनिया के सामने रखा।.. यह वह मार्ग है, जिस पर हम आपसे (यूरोप से) हमारे साथ जुडऩे का अनुरोध करते हैं। यह वह मार्ग है, जिस पर हम पहले भी साथ चले हैं और आशा करते हैं कि फिर से एक साथ चलेंगे।ज्
ईरान ना तो परमाणु बम बनाने की ओर बढ़ रहा था, और ना ही उससे अमेरिका को कोई तात्कालिक खतरा था, ये बातें खुद ट्रंप प्रशासन ने आधिकारिक रूप से कही हैं। पहले कांग्रेस (संसद) की ब्रीफिंग में इसे कहा गया। फिर विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि अगर अमेरिका हमला नहीं करता, तो ईरान पर होने वाले इजराइली हमले के जवाब में ईरान अमेरिकी ठिकानों को भी निशाना बनाता। इसलिए एहतियातन अमेरिका उस हमले में शामिल हुआ, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनई मारे गए। यानी हमला इजराइल को करना था, जिसे ढाल प्रदान करने के लिए अमेरिका ने एक बार फिर से अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं की धज्जियां उड़ाईं।
दरअसल, इन दिनों अमेरिकी शासकों का जो व्यवहार है, उसमें आक्रोश, आक्रामकता, बेशर्मी और बेपदर्गी की ऐसी मिसालें भरपूर देखी जा सकती हैं। सही-गलत का ख्याल अक्सर आक्रोश की अवस्था में भूलने लगता है। आक्रामकता की स्थिति में तो व्यक्ति को इसका अहसास भी नहीं रहता कि परदे और नग्नता की हद को वह कब पार कर गया! इन दिनों डॉनल्ड ट्रंप और उनके सहकर्मी अक्सर ये हद पार करते नजर आए हैं।
इस क्रम में उन्होंने खुद उन नियमों और उसूलों को दरकिनार कर दिया है, जिनका बखान कर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने लंबे समय तक दुनिया को भरमाये रखने के लिए किया था। लोकतंत्र, मानव अधिकार, नियम आधारित विश्व व्यवस्था आदि ऐसी ही बातें थीं, जिनके जरिए पश्चिम ने अपना सॉफ्ट पॉवर बनाया। पिछले महीने उसी पश्चिम का हिस्सा- कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दावोस में यह बेलाग मंजूर किया था कि नियम आधारित दुनिया की वो बातें कहानी भर थीं।
कार्नी ने कहा- हम जानते थे कि नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की कहानी फर्जी थी। मजबूत देश अपनी सुविधा-असुविधा के मुताबिक उन नियमों से अपने को मुक्त कर लेते थे। व्यापार संबंधी नियम असमान रूप से लागू किए जाते थे। लेकिन ये कहानी उपयोगी थी।..
जाहिरा तौर पर यह कथा पश्चिमी देशों के लिए ही उपयोगी थी। मगर इस कहानी की साख बनाए रखने के लिए पश्चिम को भी कुछ मर्यादाओं का पालन करना पड़ता था। मगर अब ऐसा करने की कीमत – खासकर पश्चिमी साम्राज्यवाद की अग्रणी ताकत अमेरिका के लिए, उससे मिलने वाले लाभ से अधिक हो गई है। तो ट्रंप काल में अमेरिकी शासक वर्ग ने तमाम नकाब उतार फेके हैं। और ऐसा सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं हुआ है। उसने ऐसा अपने देश के अंदर भी किया है, जहां तेज हुए वर्ग संघर्ष के बीच लोकतंत्र और न्याय के आवरण को बनाए रखना उसे महंगा मालूम पडऩे लगा है, मगर इस लेख में हमारा विषय यह नहीं है। यहां हम अपना ध्यान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी साम्राज्य के बेनकाब होते चेहरे पर केंद्रित कर रहे हैं।
इस सिलसिले में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में दिया गया भाषण उल्लेखनीय बना हुआ है। इस भाषण में रुबियो ने पश्चिम के औपनिवेशिक दौर को अतीत-मोह के साथ याद किया और उस दौर को वापस लाने का इरादा खुलेआम जताया। इस प्रयास में उन्होंने यूरोप का साथ मांगा, तो फिलहाल ट्रंप प्रशासन के ठोकरों से आहत यूरोपीय नेताओं में उत्साह दौड़ गया। भाषण का यही एकमात्र हिस्सा रहा, जब यूरोपीय नेताओं ने खड़े होकर तालियां बजाईं!
डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन की विदेश एवं युद्ध नीतियों का क्या मकसद है, अपने इस भाषण में मार्को रुबियो ने इसे दो-टूक या बेहिचक लहजे में दुनिया के सामने रखा। उनके भाषण का वो हिस्सा आज के दौर में ना सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरे पश्चिम की बेचैनी को समझने का महत्त्वपूर्ण स्रोत है। गुजरे एक साल में ट्रंप प्रशासन के कदमों का उल्लेख करते हुए रुबियो ने कहा-यह वो मार्ग है, जिस पर राष्ट्रपति ट्रंप और संयुक्त राज्य अमेरिका ने कदम रखा है। यह वह मार्ग है, जिस पर हम आपसे (यूरोप से) हमारे साथ जुडऩे का अनुरोध करते हैं। यह वह मार्ग है, जिस पर हम पहले भी साथ चले हैं और आशा करते हैं कि फिर से एक साथ चलेंगे।ज्
दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति से पहले पांच शताब्दियों तक पश्चिम का विस्तार हो रहा था- उसके मिशनरी, तीर्थयात्री, सैनिक, खोजकर्ता आदि अपने तटों से निकलकर महासागरों को पार करते हुए, नए महाद्वीपों पर बसते रहे। वे, दुनिया भर में जाकर विशाल साम्राज्यों का निर्माण करते रहे।ज्
लेकिन 1945 से- कोलंबस के युग के बाद पहली बार- यह सिकुडऩे लगा। (दूसरे विश्व युद्ध में) यूरोप खंडहर में तब्दील हो चुका था। उसका आधा हिस्सा आयरन कर्टेन (यानी सोवियत खेमे में) के पीछे चला गया। ऐसा लगता था कि बाकी हिस्सा भी जल्द ही उसका अनुकरण करेगा। महान पश्चिमी साम्राज्य अंतिम पतन की ओर बढ़ चुके थे, जिस प्रक्रिया को ईश्वरविहीन साम्यवादी क्रांतियों और उपनिवेशवाद-विरोधी विद्रोहों ने और तेज कर दिया। ऐसा लगने लगा कि ये विद्रोह आने वाले वर्षों में दुनिया को बदल देंगे और मानचित्र के विशाल हिस्सों पर लाल हसुआ- हथौड़े का परचम लहरा देंगे।ज्
उस पृष्ठभूमि में, तब भी और अब भी, कई लोग यह मानने लगे कि पश्चिम के प्रभुत्व का युग समाप्त हो गया है। पश्चिम का भविष्य अब उसके अतीत की एक धुंधली और क्षीण प्रतिध्वनि मात्र होगा। लेकिन साथ मिलकर, हमारे पूर्ववर्तियों ने पहचाना कि पतन महज एक विकल्प है। यह एक ऐसा विकल्प था, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। यह हमने एक बार पहले भी एक साथ किया था और यही वो काम है जिसे राष्ट्रपति ट्रंप और संयुक्त राज्य अमेरिका अब आपके साथ मिलकर फिर से करना चाहते हैं।।।।।
यही कारण है कि हम नहीं चाहते कि हमारे सहयोगी अपराध बोध और शर्म की बेडिय़ों में जकड़े रहें। हम ऐसे सहयोगी चाहते हैं, जो अपनी संस्कृति और अपनी विरासत पर गर्व करें, जो समझें कि हम एक ही महान और सभ्य सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं, और जो साथ मिलकर उसकी रक्षा करने को इच्छुक और सक्षम हों।
यानी रुबियो ने यूरोप से कहा कि उपनिवेशवादी दौर में मानव संहार, लूट एवं ज्यादतियों की अपनी करतूत को लेकर वह किसी आत्म-ग्लानि में ना रहे। बल्कि दुनिया को फिर से अपनी मु_ी में लेने की मुहिम में वो अमेरिका के साथ चल निकले! इसलिए यह याद करना जरूरी हो जाता है कि उन पांच शताब्दियों असल में हुआ क्या था? सरसरी नजर डाले:
तब दुनिया के अनेक हिस्सों में मूलवासी लोगों का सामूहिक सफाया हुआ?
अफ्रीकियों को गुलाम बनाया गया?
उपनिवेश बने देशों की अर्थव्यवस्थाओं को हिंसक ढंग से तबाह किया गया।?
उन देशों को इस कदर लूटा गया कि यूरोप और अमेरिका धन संचय कर सकें।?
नतीजतन, भारत जैसे देश जिस गरीबी और पिछड़ेपन का शिकार हुए, उससे उबरने के संघर्ष में वे आज तक जुटे हुए हैं।?
जिन मिशनरियों, तीर्थयात्रियों, सैनिकों, खोजकर्ताओं को रुबियो ने रोमांटिक रूप में पेश किया, वे भूमि-चोरी, जबरन धर्मांतरण, और सामूहिक हत्याओं के एजेंट थे।?
एशिया, अफ्रीका, और लैटिन अमेरिका के देशों में पश्चिमी उपनिवेशवाद संगठित मानवीय पीड़ा की वजह बना, जिसे ट्रंप प्रशासन फिर से दुनिया की नियति बनाना चाहता है।?
वैसे नकाब अब जाकर हटा है, लेकिन बाकी दुनिया को गुलाम बनाए रखने के मकसद को पश्चिम ने कभी नहीं छोड़ा था। 1945 के बाद उसने उसे छोडऩे का नाटक किया या लोकतंत्र और मानव अधिकार जैसे उसूलों का लाबादा ओढ़ा, तो उसका कारण बन रही वो नई दुनिया थी, जिसके प्रमुख नायक निरीश्वरवादी कम्युनिस्ट और उपनिवेशवाद विरोधी शक्तियां थीं। लाल हसुआ- हथौड़ा का परचम उस दुनिया की निशानी बने थे। उसका भय ऐसा था कि पश्चिम के साम्राज्यवादी नेताओं को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी।
एक दौर में ये रणनीति कामयाब होती दिखी। लेकिन जल्द ही साफ हो गया कि दुनिया में प्रति-क्रांतियां जरूर होती हैं, लेकिन उससे अंतिम रूप से विकासक्रम की दिशा नहीं पलट जाती। तो 1945 के बाद नव-उपनिवेशवाद या साम्राज्यवाद के जरिए दुनिया को अपने शिकंजे में रखने की रणनीतियां भी आखिरकार बेअसर होने लगीं। अब हम उस मुकाम पर हैं, जब पश्चिम की हार्ड और सॉफ्ट अथवा प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरह की साम्राज्यवादी रणनीतियां बेअसर हो रही हैं। इसकी बेचैनी का परिणाम ट्रंप काल है। (यहां हम ट्रंप काल शब्द का इस्तेमाल अक्षरश: नहीं, बल्कि एक प्रतीक के रूप में कर रहे हैं, जिसकी अवधि असल में डॉनल्ड ट्रंप के व्यक्तिगत शासनकाल से कहीं अधिक बड़ी है।)
गौरतलब है कि ये अंतर्विरोध उस समय उभरा है, जब प्रत्यक्ष रूप से लाल हसुआ- हथौड़ा का परचम आगे बढ़ता हुआ नहीं दिखता। अफ्रीका से साहेल क्षेत्र को छोड़ दें, तो दुनिया के बाकी हिस्सों में बीसवीं सदी जैसी उपनिवेशवाद विरोधी चेतना की निशानियां भी नजर नहीं आतीं। दुनिया में इस समय कोई वैसा विचारधारात्मक संघर्ष भी छिड़ा नजर नहीं आता, जैसा सोवियत संघ की मौजूदगी के पूरे दौर में दिखा था। इसके बावजूद वस्तुगत परिस्थितियां ऐसी बनी हैं, जिसके बीच अमेरिकी साम्राज्यवाद को महसूस हुआ है कि उसके कदमों से नीचे से जमीन खिसक रही है। इस रूप में भौतिक द्वंद्ववाद ने पुनर्अभिव्यक्ति की है।
दुनिया जिस मुकाम पर है, उसे समझने और यहां से आगे जिस ओर वो जा सकती है, उसका अनुमान लगाने के लिए यह जरूरी है कि इस द्वांद्वात्मकता समझने की कोशिश की जाए। इस क्रम में यह साफ होता है कि ‘ईश्वरविहीन साम्यवादÓ के सर्व प्रथम प्रयोग (सोवियत संघ) पर एक बिंदु पर आकर जो विराम लगा, वह असल में एक अल्प-विराम था।
दुनिया के एक दूसरे हिस्से- यानी चीन- में वह प्रयोग दूसरे रूप में आगे बढ़ा। उसी के परिणामस्वरूप वैश्विक स्तर पर वह अंतर्विरोध खड़ा हुआ है, जिसने पश्चिमी को बेचैन कर रखा है। इसमें ऊपरी तौर पर वैचारिक संघर्ष के तत्व कम नजर आते हैं, तो उसकी वजह इसका स्वरूप परिवर्तन भर है। इस बार वैचारिक पक्ष ‘दो आर्थिक प्रणालियोंÓ के टकराव की चर्चाओं में व्यक्त हो रहा है। विश्व व्यवस्था एवं अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रति दो अलग दृष्टिकोणों की चर्चाएं आज आम हैं। विकास के मॉडल एवं तकनीक के उपयोग के दो अलग एवं प्रतिस्पर्धी प्रतिमान की बातें आज विमर्श के केंद्र में हैं।
यह यूं ही नहीं है कि 2011 के बाद से चीन का उदय रोकना पश्चिम की प्राथमिकता बनी हुई है। अब चूंकि ये धारणा मजबूत हो गई है कि ऐसा करना संभव नहीं है, तो युद्ध की व्यापक व्यूह-रचना में अमेरिका ने अपनी पूरी ताकत लगा रखी है। आज अमेरिकी युद्ध तंत्र के निशाने की अग्रिम कतार में तमाम वो देश ही हैं, जिनके चीन से करीबी रिश्ते हैं। वेनेजुएला, क्यूबा, ईरान- इन सबको एक खास योजना के तहत निशाने पर लिया गया है। रूस को चीन से अलग करने की कोशिशें भी इसी रणनीति का हिस्सा हैं। मकसद है कि चीन को अलग-थलग करने के बाद उससे निपटा जाए। सोच यह है कि अगर यह हो गया, तो फिर पांच शताब्दियों तक विस्तार के इतिहास को फिर से दोहराया जा सकेगा।
मगर यह खामख्याली से ज्यादा कुछ नहीं है। वस्तुगत परिस्थितियां मनोगत इच्छाओं से बदली नहीं जा सकतीं। मनोगत इच्छाओं से मानव समाज को युद्ध के विनाश में झोंका जा सकता है, मगर एक समझ यह भी है कि आधुनिक युग में युद्ध और क्रांतियां साथ-साथ आगे बढ़ी हैं। तात्पर्य यह कि युद्ध का उन्माद उपनिवेशवादी पांच शताब्दियों की वापसी के बजाय संभव है कि ‘हसुआ-हथौड़े के लाल परचमÓ की जमीन फिर से तैयार करे।
ये संकेत पहले से हैं कि ईश्वरविहीन कम्युनिस्ट वैचारिक स्तर पर उस धूल को झाड़ कर फिर से खड़े हो रहे हैं, जो पश्चिम ने सुनियोजित दुष्प्रचार से उड़ाई थी और जो सोवियत संघ के विघटन के साथ सघन हो गई। कम्युनिस्ट समूहों में अपने विरासत के पुनर्मूल्यांकन, वास्तविक समाजवादी प्रयोगों के बचाव, चरमपंथी प्रवृत्तियों को छोडऩे और अराजक रुझानों को चुनौती देने की जितनी गतिविधियां हम आज होते देख रहे हैं, वैसा 1990 के बाद कभी नजर नहीं आया था।
मार्को रुबियो को इस बात का श्रेय देना होगा कि भले उनका मकसद विपरीत हो, लेकिन बीसवीं सदी में जो हुआ, उसे उन्होंने सही ढंग से समझा है। उन्होंने उचित ही इस तथ्य का उल्लेख किया कि पश्चिमी साम्राज्यवाद पर लगाम कम्युनिस्टों और उपनिवेशवाद विरोधी विद्रोहों ने लगाई थी। वैसे लाल हसुआ-हथौड़े के परचम का प्रभाव उपनिवेशवाद विरोधी विद्रोहों के ऊपर भी स्पष्ट नजर आता था। इसीलिए उस विचार को शत्रु के रूप में चित्रित करना ट्रंप प्रशासन की खास रणनीति है।
इन दिनों अमेरिका में साम्यवाद के शिकार स्मारक फाउंडेशन के तहत नए स्मारक बनाए गए हैं। इन्हें साम्यवाद के शिकार स्मारक नाम दिया गया है। अमेरिकी राज्य फ्लोरिडा में हर साल सात नवंबर को साम्यवाद के शिकार दिवस मनाने की शुरुआत की गई है। 1917 में रूस में बोल्शेविक क्रांति सात नवंबर को ही हुई थी। 2025 में फ्लोरिडा स्टेट बोर्ड ऑफ एजुकेशन ने हाई स्कूलों में साम्यवाद के इतिहास के मानक पढ़ाने का फैसला किया। 2026-27 के सत्र से कम्युनिस्ट अत्याचार से संबंधित अध्याय को पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया है।
मगर इन सब प्रयासों का एक परिणाम यह भी है कि कम्युनिज्म और उपनिवेशवाद/ साम्राज्यवाद विरोधी शक्तियां फिर से चर्चा के केंद्र में आई हैं। इस्लामी क्रांति के बाद ईरान की खूबी यह रही कि धर्मसत्ता होने के बावजूद हमेशा उसने अमेरिकी साम्राज्य को चुनौती दी। 28 फरवरी को हुए हमले के बाद उसने फिर यह दिखाया कि ढहता हुआ ये साम्राज्य अब इस दौर में भले बेहद हिंसक हो गया हो, लेकिन उसमें ज्यादा दम नहीं बचा है। आखिरकार इस साम्राज्य का सामना उन शक्तियों से हो रहा है, जो उसके वर्चस्व के दौर का अंतिम अध्याय लिखने के लिए उठ खड़ी हुई हैँ।
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