हरिशंकर व्यास
अब सवाल है कि नीतीश कुमार से मोदी और शाह का बदला पूरा हो गया लेकिन आगे क्या? आगे भाजपा किसको मुख्यमंत्री बनाएगी यह लाख टके का सवाल है। भाजपा ने पिछले 10 सालों में जिस तरह के लोगों को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया उसे देख कर तो लगता है कि मोदी और शाह का एकमात्र लक्ष्य लोगों को हैरान करना या चौंकाना होता है। वे चुन कर ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाते हैं, जिसके बारे में किसी ने नहीं सोचा हो। जितने नाम पहले से चल रहे होते हैं उनको छोड़ कर किसी अन्य को सीएम बनाया जाता है। भजनलाल शर्मा से लेकर मोहन यादव, मोहन चरण मांझी और रेखा गुप्ता तक इसकी अनगिनत मिसाले हैं। लेकिन क्या बिहार में भाजपा इसी तरह का प्रयोग कर सकती है?
यह थोड़ा मुश्किल लग रहा है क्योंकि बाकी राज्यों की तरह भाजपा को बिहार में अकेले बहुमत नहीं मिला है। दूसरे, बिना नीतीश की पार्टी के बाकी सहयोगियों के साथ भी भाजपा का पूर्ण बहुमत नहीं बनता है। दूसरी ओर मजबूत प्रादेशिक पार्टी के तौर पर राजद है, जो मौके का फायदा उठाने को तैयार है। इसलिए भाजपा को जातीय समीकऱण का ध्यान रखना है तो साथ साथ नीतीश की पार्टी की पसंद का ख्याल भी रखना है। इसके अलावा कमान ऐसे नेता को देनी होगी, जो राजद से लड़ सके और गैर यादव पिछड़ी जाति के समीकरण का प्रतिनिधित्व करता हो। भाजपा यादव चेहरे का प्रयोग पहले कर चुकी है। 2015 में भाजपा ने यह प्रयोग किया था। नित्यानंद राय प्रदेश अध्यक्ष, भूपेंद्र यादव प्रभारी और रामकृपाल यादव केंद्र में मंत्री थे। भाजपा ने जम कर टिकट भी दी लेकिन 2015 का वह प्रयोग विफल रहा था।
इस बार भाजपा और जदयू दोनों ने खुल कर गैर यादव राजनीति की। यादव नेताओं की टिकट काटी गई और उसकी जगह दूसरी मझोली जातियों खास कर कोईरी, कुर्मी और धानुक को आगे बढ़ाया गया। उनके ज्यादा विधायक जीत कर विधानसभा पहुंचे हैं। दूसरी बात यह है कि बिहार भाजपा के सबसे बड़े यादव नेता नंदकिशोर यादव को नगालैंड का राज्यपाल बनाया गया है। सो, यादव सीएम का प्रयोग शायद नहीं होगा। इसकी बजाय भाजपा के लिए सबसे सुरक्षित मौजूदा फॉर्मेशन को बनाए रखना है। यानी कोईरी, कुर्मी और धानुक के प्रयोग को जारी रखना ङाजपा के लिए सुरक्षित भी होगा और उसके सामाजिक समीकरण के अनुकूल भी होगा। नीतीश कुमार और उनकी पार्टी का समर्थन भी इस पर मिलेगा।
इस लिहाज से उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पहली पसंद हो सकते हैं। अभी जनता दल यू के मुख्यमंत्री के साथ भाजपा के दो उप मुख्यमंत्री हैं। वैसे ही भाजपा के मुख्यमंत्री के साथ जदयू के दो उप मुख्यमंत्री हो सकते हैं। ऐसा लग रहा है कि अंत में नीतीश कुमार के बेटे निशांत को उप मुख्यमंत्री पद के लिए चुना जाएगा। सो, कोईरी मुख्यमंत्री और कुर्मी उप मुख्यमंत्री भाजपा की गैर यादव पिछड़ी जाति के राजनीति में फिट होंगे और उत्तर प्रदेश के चुनाव के लिहाज से भी यह समीकरण काम करेगा। दूसरा उप मुख्यमंत्री सवर्ण होगा या दलित यह जनता दल यू को अपनी पार्टी की राजनीति के लिहाज से तय करना है।
भाजपा में वैश्य या अति पिछड़ा मुख्यमंत्री के प्रयोग की बात भी की जा रही है। इस लिहाज से संजीव चौरसिया से लेकर दिलीप व संजय जायसवाल और सुनील कुमार पिंटू से लेकर धर्मशिला गुप्ता तक के नाम की चर्चा है। दलित चेहरे के तौर पर जनक राम का नाम भी लिया जा रहा है। लेकिन भाजपा ने नीतीश कुमार को हटाने का प्रयोग सफलतापूर्वक पूरा किया है तो दूसरे प्रयोग के लिए उसे इंतजार करना होगा। एक प्रयोग के बीच में दूसरा प्रयोग नुकसानदेह हो सकता है। लव कुश समीकरण यानी कोईरी, कुर्मी, धानुक के समीकरण को तोडऩे का जोखिम भाजपा अभी शायद ही ले। अगर भाजपा ऐसा कोई प्रयोग करती है तो नीतीश कुमार की पार्टी में नाराजगी होगी। इसका भी भाजपा को ख्याल रखना होगा।
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