ग्वालियर 27 March, (Rns): मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पति-पत्नी के बीच विवाद से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि वैवाहिक संबंधों के दायरे में आने वाले यौन संबंधों को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के तहत “अप्राकृतिक अपराध” नहीं माना जा सकता।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की एकल पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप, भले ही प्रथम दृष्टया सही माने जाएं, लेकिन वे वैवाहिक संबंधों के भीतर के कृत्य हैं। ऐसे में भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में मौजूद “वैवाहिक अपवाद” लागू होता है, जिसके चलते इन्हें धारा 377 के तहत अपराध नहीं ठहराया जा सकता।
धारा 377 का आरोप निरस्त
अदालत ने आरोपी पति की याचिका पर आंशिक राहत देते हुए उसके खिलाफ धारा 377 के तहत दर्ज मामला रद्द कर दिया। साथ ही, मामले में नामजद ननद के खिलाफ भी आपराधिक कार्रवाई खत्म कर दी गई, क्योंकि उसके खिलाफ कोई ठोस साक्ष्य नहीं पाए गए।
अन्य आरोपों पर सुनवाई जारी
हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति, सास और ससुर के खिलाफ दहेज प्रताड़ना समेत अन्य गंभीर आरोपों में पर्याप्त आधार मौजूद है। इसलिए इन धाराओं के तहत ट्रायल जारी रहेगा।
क्या है पूरा मामला
मामला भिंड जिले का है, जहां महिला ने आरोप लगाया था कि शादी में लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद ससुराल पक्ष अतिरिक्त दहेज की मांग कर रहा था। मांग पूरी न होने पर उसे प्रताड़ित किया गया, मारपीट की गई और घर से निकाल दिया गया। महिला ने पति पर जबरन अप्राकृतिक संबंध बनाने का आरोप भी लगाया था। कोर्ट के इस फैसले को वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि अन्य आरोपों पर न्यायिक प्रक्रिया अभी जारी है।

