हरिशंकर व्यास
बिहार से नीतीश कुमार की विदाई सिर्फ एक व्यक्ति की राजनीति का अंत नहीं है। न ही एक पार्टी की राजनीति के कमजोर होने का संकेत है। यह मंडल की राजनीति पर पूर्णविराम का संकेत है। एक एक करके वैसे भी मंडल की राजनीति करने वाले नेता राजनीतिक परिदृश्य से लुप्त हैं। मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और रामविलास पासवान का निधन हो गया है, जबकि लालू प्रसाद यादव चुनाव लडऩे के अयोग्य ठहराए जा चुके हैं। अब वे सक्रिय राजनीति करने में भी शारीरिक रूप से सक्षम नहीं हैं। मंडल राजनीति की आखिरी बड़े नेता नीतीश कुमार हैं, जिनका रिटायरमेंट प्लान भाजपा ने तैयार कर दिया है। सोचें, जिस नीतीश कुमार ने जीवन भर मुख्यमंत्री बने रहने की राजनीति की और तमाम किस्म के गठबंधन बदल दिए उनको कहना पड़़ा है कि वे एक बार राज्यसभा जाकर देखना चाहते थे। ध्यान रहे नीतीश ने कई बार सहयोगी बदले। गठबंधन की पार्टियां बदलीं लेकिन मुख्यमंत्री बने रहे। करीब 20 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद अब वे राज्यसभा जा रहे हैं।
नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना या मुख्यमंत्री पद छोडऩा अपने आप में मंडल की राजनीति पर पूर्णविराम नहीं है। असली बात यह है कि उनके हाथ से बिहार की कमान निकल रही है। बिहार की राजनीति अब पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी के हाथ में जा रही है। भाजपा का मुख्यमंत्री बनेगा और बिहार की राजनीति लगभग पूरी तरह से दो ध्रुवीय हो जाएगी। नीतीश की पार्टी रहेगी लेकिन वह भाजपा पर निर्भर होगी। दूसरी ओर तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद होगा, जिसके साथ कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों का गठबंधन है। सो, मंडल की राजनीति पर पूर्णविराम के साथ साथ कह सकते हैं कि बिहार में बहुध्रुवीय राजनीति अब ज्यादा केंद्रीकृत होगी। भाजपा के मजबूत होने और राजनीति की केंद्रीय ताकत बनने से उसके साथ वाली बाकी पार्टियों की हैसियत कमजोर होगी, चाहे वह पार्टी चिराग पासवान की हो या उपेंद्र कुशवाहा की या जीतन राम मांझी की हो।
तह सकते है कि आखिर नरेंद्र मोदी की सरकार भी चारों तरफ आरक्षण बढ़ा रही है, अलग अलग क्षेत्रों में नए आरक्षण दे रही है, जाति जनगणना कराने जा रही है, उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव खत्म करने के नाम पर सामाजिक विद्वेष फैलाने वाली यूजीसी की नियमावली जारी करती है तो फिर कैसे यह राजनीति मंडल से अलग है? यह मंडल से इसलिए अलग है क्योंकि यह कांग्रेस और दूसरी प्रादेशिक पार्टियों की राजनीति की प्रतिक्रिया है और दूसरे इसमें अंतर्निहित तत्व कमंडल यानी धर्म की राजनीति का है। भाजपा का मकसद किसी न किसी रूप में पैन इंडिया हिंदू यूनिटी बनाने की है। पूरे भारत में हिंदू एकता बनाने के लिए भाजपा को जहां जो दांव चलना होता है वह चलती है। कहीं ईडब्लुएस का आरक्षण देकर अगड़ी जातियों को खुश करती है तो कहीं यूजीसी की नियमावली से पिछड़ी जातियों को संदेश देती है। यह एक अलग विश्लेषण का विषय है।
भाजपा बिहार में और पूरे देश में मंडल की राजनीति को कमंडल से रिप्लेस करना चाहती है। इसके लिए उसने धीरे धीरे मंडल और कमंडल को मिलाना शुरू कर दिया। मोदी ने यह माहौल बनाया कि कमंडल ही मंडल है। व्यापक हिंदू पहचान पर जोर दिया गया और यह स्थापित करने का प्रयास किया गया कि धर्मध्वजा उठाए हुए व्यक्ति की जाति क्या है यह महत्वपूर्ण नहीं है। वह कोई भी हो सकता है। असम से लेकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड, राजस्थान से लेकर महाराष्ट्र तक भाजपा ने बड़े राज्यों में सवर्ण मुख्यमंत्री बनाए हैं। लेकिन सोशल मीडिया में सवर्ण इकोसिस्टम के लोग आक्रामक तरीके से सरकार पर हमला कर रहे हैं और यूजीसी के नियमों के हवाले से केंद्र की मोदी सरकार को अगड़ा विरोधी बता रहे हैं। यह भी अंतत: मोदी के लिए फायदे वाला ही साबित होगा। क्योंकि यूजीसी की नियमावली सिर्फ नैरेटिव बनाने के लिए लाई गई थी। सरकार का काम सवर्ण लोग सोशल मीडिया में कर रहे हैं। इसे लेकर नरेंद्र मोदी और धर्मेंद्र प्रधान पर जितना हमला हो रहा है, पिछड़ी और दलित जातियों का उतना ही ध्रुवीकरण उनके पक्ष में हो रहा है।
बहरहाल, जाति और खास कर पिछड़ी जातियों की गोलबंदी के साथ साथ मंडल की राजनीति का एक बुनियादी तत्व यह है कि उसके नेता सेकुलर प्रैक्टिस करते हैं। उनकी राजनीति में मुस्लिम को अलग थलग करने की प्रवृत्ति नहीं रहती है। बिहार में लालू प्रसाद की तरह ही नीतीश कुमार भी पिछड़ी जातियों को एकजुट करते रहे और साथ ही मुस्लिम समाज की पिछड़ी जातियों को, जिनको पसमांदा कहते हैं उन्हें भी जोड़ा। मंडल राजनीति का दूसरा तत्व यह है कि उसमें पिछड़ी जातियों का प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरह से वर्चस्व होता है। तीसरी बात यह है कि उन्हें एकजुट करने के लिए धर्म की गोंद नहीं चाहिए, बल्कि सत्ता संरचना में हिस्सेदारी चाहिए। नीतीश की विदाई से बिहार में पिछड़ी जातियों के प्रत्यक्ष व परोक्ष वर्चस्व समाप्त होगा, सत्ता संरचना में हिस्सेदारी कम होगी और धर्म की गोंद का इस्तेमाल एकजुटता के लिए किया जाएगा। बिहार की 18 फीसदी मुस्लिम आबादी वैसे ही अलग थलग होगी, जैसे उत्तर प्रदेश में है। वहां घोषित रूप से 80 और 20 की लड़ाई का ऐलान किया जाता है।
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