नई दिल्ली 28 March, (Rns)- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक अहम और स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि कोई शादीशुदा पुरुष किसी बालिग महिला के साथ उसकी सहमति से रह रहा है, तो इसे अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि समाज की नैतिक सोच और कानून की परिभाषा अलग-अलग होती है, और जब तक कोई कानून नहीं टूटता, केवल सामाजिक आधार पर किसी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती।
डिविजन बेंच—जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना—ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता जोड़े की गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगा दी। साथ ही पुलिस को निर्देश दिया कि दोनों को सुरक्षा प्रदान की जाए, क्योंकि उन्हें जान का खतरा बताया गया है।
परिवार को सख्त चेतावनी, पुलिस पर जिम्मेदारी
कोर्ट ने महिला के परिवार को भी सख्त हिदायत दी कि वे किसी भी रूप में जोड़े को परेशान न करें—न घर जाकर, न फोन या मैसेज के जरिए और न ही किसी तीसरे व्यक्ति के माध्यम से संपर्क करने की कोशिश करें। इसके अलावा, शाहजहांपुर के पुलिस अधीक्षक (SP) को व्यक्तिगत रूप से सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। अदालत ने कहा कि वयस्कों की सुरक्षा सुनिश्चित करना पुलिस का दायित्व है।
‘शक्ति वाहिनी’ केस का हवाला
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2018 के शक्ति वाहिनी केस का हवाला देते हुए कहा कि ऑनर किलिंग जैसे मामलों में पहले से स्पष्ट दिशानिर्देश मौजूद हैं, जिनका पालन किया जाना चाहिए।
अपहरण का केस, अब कोर्ट में चुनौती
मामला जैतीपुर थाना क्षेत्र का है, जहां महिला की मां ने 8 जनवरी 2026 को एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोप था कि युवक उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर ले गया। पुलिस ने बीएनएस की धारा 87 के तहत मामला दर्ज किया था, जिसे रद्द कराने के लिए जोड़ा हाईकोर्ट पहुंचा।
कोर्ट में क्या कहा गया?
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि वे दोनों बालिग हैं और अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं। वहीं विरोधी पक्ष ने दलील दी कि पुरुष पहले से शादीशुदा है, इसलिए यह संबंध अवैध है। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सहमति से साथ रहने वाले बालिगों पर केवल इस आधार पर आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता।
ऑनर किलिंग का खतरा, पुलिस पर सवाल
महिला ने पहले ही पुलिस को लिखित शिकायत देकर बताया था कि उसके परिवार से उसे ‘ऑनर किलिंग’ का खतरा है। इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, जबकि यह उसकी जिम्मेदारी थी। अब इस मामले की अगली सुनवाई 8 अप्रैल को होगी, जिसमें दोनों पक्षों से जवाब मांगा गया है।

